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Amazing Facts About Ocean in Hindi – समुद्र के रहस्य और आश्चर्यजनक तथ्य

Some Very Interesting & Amazing Facts About Sea Ocean in Hindi, General Knowledge & Facts about Oceans

हम धरती के केवल एक तिहाई हिस्से में ही रहते हैं, पृथ्वी के बाकी हिस्से पर बहुत-सा पानी यानी महासागर हैं। पृथ्वी पूरे सौरमंडल मे एकमात्र ग्रह है, जहां पर महासागर पाए जाते हैं।

महासागर पृथ्वी के लगभग 70.8 % भाग पर फैले हुए हैं। विश्व के महासागरों एवं सागरों का क्षेत्रफल लगभग 367 मिलियन वर्ग किलोमीटर है, जो मंगल ग्रह के क्षेत्रफल का दो गुना तथा चाँद के क्षेत्रफल का नौ गुना है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र का जन्म आज से लगभग 50 करोड़ से 100 करोड़ वर्षों के बीच हुआ होगा। दरअसल, धरती के विशालकाय गड्ढ़े पानी से कैसे भर गए यह अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है। दूसरी ओर इतने विशालकाय गड्‍ढे कैसे निर्मित हुए यह भी एक बड़ा सवाल है। वैज्ञानिक कहते हैं कि जब पृथ्वी का जन्म हुआ तो वह आग का एक गोला थी। जब पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी होने लगी वे उसके चारों तरफ गैस के बादल फैल गए। ठंडे होने पर ये बादल काफी भारी हो गए और उनसे लगातार मूसलाधार वर्षा होने लगी। लाखों साल तक ऐसा होता रहा। पानी से भरे धरती की सतह के ये विशाल गङ्ढे ही बाद में समुद्र कहलाए।

विश्व का लगभग 98 प्रतिशत जल समुन्द्रो में, लगभग 2 प्रतिशत नदियों, झीलों, भूगर्त तथा मिट्टी में है। जल की बहुतायत के कारण पृथ्वी को ‘जल ग्रह’ कहा जाता है। यदि पृथ्वी के उच्चावच (पर्वतीय और मैदानी भाग) को सागर में डालकर समतल कर दिया जाए तो पूरी पृथ्वी पर सागर की गहराई लगभग 2.25 किलोमीटर होगी। जल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव हो सका हैं।

समुन्द्र के पानी की विशेषता इसका खारा या नमकीन होना है। पानी को यह खारापन मुख्य रूप से ठोस सोडियम क्लोराइड द्वारा मिलता है, लेकिन पानी में पोटेशियम और मैग्नीशियम के क्लोराइड के अतिरिक्त विभिन्न रासायनिक तत्व भी होते हैं।

विश्व में प्रमुख पाँच महासागर हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं :-

  1. प्रशांत महासागर (पेसिफ़िक ओशन)
  2. अटलांटिक महासागर या अंध महासागर (अटलांटिक ओशन)
  3. हिंद महासागर (इंडियन ओशन)
  4. आर्कटिक महासागर (आर्कटिक ओशन)
  5. अंटार्कटिक महासागर अथवा दक्षिणी महासागर (अंटार्कटिक ओशन)  यह महासागर अपने आस-पास पाए जाने वाले वातावरण के कारण साल भर बर्फ से ढका रहता है।
# नाम क्षेत्रफल (हजार वर्ग कि.मी) अधिकतम गहराई (मीटर में)
1. भूमध्य सागर 2,505 4,846
2. हिन्द महासागर 73,481 8,047
3. आंध महासागर 82,217 9,200
4. आर्कटिक महासागर 14,057 5,450
5. प्रशांत महासागर 1,65,384 11,033

 

महासागरों के अधिकतर तल बाद में बने हुए हैं, जिनकी आयु 8 करोड़ वर्ष से कम है। यूरेशिया तथा अफ्रीकी प्लेटों के एक दूसरे के निकट आने तथा टकराने के कारण आज के महाद्वीपों तथा महासागरों का स्वरूप बना।

महासागर पर्यावरण संतुलन में भी प्रमुख भूमिका अदा करता है। पृथ्वी पर जीवन का आरंभ महासागरों से माना जाता है। महासागरीय जल में ही पहली बार जीवन का अंकुर फूटा था। आज महासागर असीम जैव विविधता का भंडार है।

अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं। पृथ्वी के विशाल क्षेत्र में फैले अथाह जल का भंडार होने के साथ महासागर अपने अंदर व आस-पास अनेक छोटे-छोटे नाजुक पारितंत्रो और जीवो को पनाह देते हैं जिससे उन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के जीव व वनस्पतियाँ पनपती हैं। महासागरों में पृथ्वी का सबसे विशालकाय जीव व्हेल से लेकर सूक्ष्म जीव भी मिलते हैं। एक अनुमान के अनुसार केवल महासागर के अंदर करीब दस लाख प्रजातियां उपस्थित हो सकती हैं।

जैव विविधता से संपन्न होने के साथ महासागर धरती के मौसम को भी निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक हैं। समुद्री जल की लवणता और विशिष्ट ऊष्माधारिता का गुण पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है। अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्री जल दिन में सूर्य की ऊर्जा का बहुत बड़ा भाग अपने में समा लेता है। इस प्रकार अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण समुद्र ऊष्मा का भण्डारक बन जाता है जिसके कारण विश्व भर में मौसम संतुलित बना रहता है या फिर यूं कहें कि जीवन के लिए औसत तापमान बना रहता है। मौसम के संतुलन में समुद्री जल की लवणता जीवन के लिए एक वरदान है।

कुछ आश्चर्यजनक तथ्य

महासागरों के तटीय क्षेत्रों में दिनों-दिन प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है यह चिंता का विषय हैं।
तटीय क्षेत्र विशेष कर नदियों के मुहानों पर सूर्य के प्रकाश की पर्याप्ता के कारण अधिक जैव विविधता वाले क्षेत्रों के रूप में पहचाने जाते थे, वहीं अब इन क्षेत्रों के समुद्री जल में भारी मात्रा में प्रदूषणकारी तत्वों के मिलने से वहाँ जीवन संकट में हैं। तेलवाहक जहाजों से तेल के रिसाव के कारण एवं समुद्री जल के मटमैला होने पर उसमें सूर्य का प्रकाश गहराई तक नहीं पहुँच पाता, जिससे वहाँ जीवन को पनपने में परेशानी होती है और उन स्थानों पर जैव-विविधता भी प्रभावित होती है। यदि किसी कारणवश पृथ्वी का तापमान बढ़ता है तो महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता में कमी आएगी जिससे वायुमंडल में गैसों की आनुपातिक मात्रा में परिवर्तन होगा और तब जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियों में असंतुलन होने से पृथ्वी पर जीवन भी संकट में पड़ सकता है।

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