AchhiBaatein.com

पृथ्वी के वातावरण को बर्बाद करके मंगल की राह देखता मनुष्य

पृथ्वी के वातावरण को बर्बाद करके मंगल की ओर पाँव पसारता मनुष्य, क्या यह पैसे और जीवन की बर्बादी नहीं हैं?

इंसान ने जब पहली बार इस धरती पर कदम रखा था तो उसके पास तन ढकने के लिए कोई परिधान या वेशभूषा तक नहीं थी। उसे एक तरकीब (उपाय) सूझी और उसने पेड़ों के पत्तों को अपने गुप्तांगों पर बांधकर उसे छुपाना शुरू कर दिया।

फिर उसने विकास किया और सदियों बाद उसने विकास का चरण तय करते हुए अपने लिए वेशभूषा तैयार कर लिया। शुरुआत में वह जानवरों की तरह कच्चे भोजन के रुप में गोश्त खाता रहा। फिर उसने उपाय लगाकर आग जलाई और फिर उससे भोजन भूनकर खाने लगा।

पाषाण से आधुनिक युग तक की ये दास्तान तो बहुत लंबी है लेकिन कहने का आशय यह है कि विकास और आधुनिकता के चरणों को तय करते हुए आज मनुष्य उस मुकाम तक पहुंच चुका है कि चांद पर पहुंच जाने के बाद अब वह अपने सौरमंडल में “लाल ग्रह” के नाम से महशूर मंगल ग्रह पर भी अपने कदम जमाने की सोचने लगा है।

इस सपने को साकार करने के लिए वह अपने तमामतर समय और प्रयासों के साथ बिलियन डॉलर्स की धनराशि भी लुटा रहा है। लेकिन इस दौरान वह इस बात को भूला रहा कि वह अपने विकास के चक्कर में प्रकृति को कितना गहरा नुकसान पहुंचा रहा है और किस तरह विनाश की भयानक दास्तान लिख कर स्वयं अपने पांव पर कुल्हाड़ी का वार कर रहा है?

खुशनुमा रहा है हमारे पर्यावरण का गौरवमयी इतिहास

village life story & nature

हमारे गौरवमयी इतिहास में कभी हमारी इस दुनिया को वह रुतबा और शोहरत हासिल रही है कि पूरी दुनिया इसकी अद्वितीय प्राकृतिक सुंदरता की मिसाल पेश किया करती थी।

पुराने जमाने में कभी लोगों के बीच इसकी खूबसूरत नदियों के बहाव की चर्चा होती तो कभी इसकी खुशरंग फिज़ा में तैरते पक्षियों की आवाज कानों में रस घोल दिया करती थी। इन खूबसूरत पक्षियों के झुंड को लोगों का हुजूम अपने चेहरों पर गहरा आश्चर्य लिए निहारता रहता। सुबह सवेरे कोयल की मधुर आवाज और सुरीली राग हमारे माहौल में जहां दिल में उतर जाने वाले रंग घोल देती रही, वही मुर्गे की बाग किसी प्राकृतिक अलार्म से कम भी नहीं थी।

इस अलार्म को सुनकर लोग सुबह नींद से जाग जाया करते थे। गर्मी के सख्त मौसम में भी सूरज की तपिश से लोगों के चेहरों पर जहां कोई गंभीर आसार नहीं दिखते, वहीं उसके नरम तेवर सुबह शाम लोगों को मस्त मगन करते रहते। चारों ओर वृक्षों की घनी छाया थके मांदे राहगीरों को कहीं भी लपक लिया करती थी।

पुराने ज़माने में इंसान और कुदरत के बीच लोगों को गाढ़ी मित्रता की मिसाल दिखती थी। लेकिन इन दोनों के बीच मजबूत दोस्ती का यह रिश्ता अब काफी कमज़ोर पड़ चुका है। पशु पालन के मामले में भी दुनिया वाले अच्छी खासी दिलचस्पी दिखाया करते थे।

खुशगवार जीवन जीने के लिए स्वच्छ और साफ-सुथरी जलवायु, झमाझम बारिश से लहलहाते खेत और नदियों में बाढ़ के किस्सों के साथ सुबह एवं शाम की हार्दिक उमंग ही तो थी जो अपार गरीबी के आलम में भी लोगों को वह राहत और सुकून देती रही जिसके खरीदार आज हम अपनी सारी दौलत लुटा देने के पश्चात भी नहीं हो सकते।

हाल यह था कि खूबसूरती को लेकर दुनिया के सभी देशों के प्रांत और इलाकों का वर्चस्व कायम था। यह इलाके अपनी अपनी असामान्य सुंदरता की वजह से अलग अलग नामों से पुकारे जाते थे जिसमें कहीं किसी देश की सुबह मशहूर थी तो कहीं किसी देश की शाम!

आखिर क्यों बदल गया है सब कुछ

यह कितना दुख पहुंचाने वाला विषय है कि पूरी दुनिया में तेजी से पांव पसार रही आक्रामक गर्मी और घोर तपन ने इस दुनिया के सुंदर चेहरे को बुरी तरह झुलसा कर रख दिया है। अब इस संसार की मिसाली सुंदरता धीरे धीरे विनाश की ओर बढ़ रही है।

वायु प्रदूषण, कचरों से जुड़े विकार, जलस्तर का लगातार गिरना, जल प्रदूषण, वन संरक्षण के प्रति बरती जा रही है सावधानी, जमीन और मिट्टी की कटान से मुर्दा हो रहे खेतों ने कुछ ऐसी विनाशकारी परिस्थितियों को जन्म दे दिया है जो भारतीय परिवेश और पर्यावरण पर लगातार कहर बनकर टूट रही है।

अगर हमारे देश को देखा जाए तो हालिया वर्षों में बारिश जहां लोगों पर काल बनकर टूटती है और सामान्य दिनचर्या को बुरी तरह प्रभावित कर देती है, वहीं देश के कुछ इलाकों में बेहद काली धुंध ने लोगों को लंबे समय तक आसमान के दर्शन से भी महरूम कर दिया था।

आखिर क्यों करवट ले रहा है हमारा माहौल

आजकल हमारे देश के माहौल ने भी अजीब करवट ले ली है। जहां प्यासी जमीन बारिश के लिए तरस रही है, वहां आसमान अपने हाथ रोके हुए है और जहां समंदरों का रेला और पानी की कसरत है, वहां बादल दिल खोलकर बरस रहे हैं।

दरअसल, हमारे वातावरण से जुड़े यह सारे पहलू अनेक प्रकार के प्रदूषण से उपजे हैं जिसे अगर अपने ही कारनामे का नतीजा कहा जाए तो कुछ भी गलत नहीं होगा। अधिकतर भूवैज्ञानिक भारत के अकसर राज्यों में बढ़ते प्रदूषण की वजह निर्माण कार्यों की लहर, पॉलीथिन के प्रयोग, औद्योगिक कार्यों में आ रही तेज़ी और सड़कों पर बढ़ती गाड़ियों की तादाद को ही स्वीकार कर रहे हैं।

आजकल गाड़ियों और पॉलिथीन का बढ़ता चलन अपने शबाब पर है जिसके खतरनाक असर को झेलना इंसानी क्षमता से बाहर की बात है। प्लास्टिक से जुड़े एक नए शोध की रौशनी में तो यही कहा जाता है कि एक प्लास्टिक को गलाने के लिए धरती को 1000 साल का लंबा सफर तय करना पड़ता है

कितनी खतरनाक बात है कि हममें से ज्यादातर लोग प्लास्टिक के चलन पर लगाई गई सरकारी पाबंदियों को भी अपनी घोर आलोचनाओं का निशाना बनाते हैं और नहीं समझते कि इसके इस्तेमाल से हम आपस में रोगजनक तत्वों का लगातार आदान प्रदान कर रहे हैं।

बढ़ते प्रदूषण पर आखिर कैसे लगेगी लगाम

बढ़ते प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए सबसे पहले तो यह जानना नितांत आवश्यक है कि जहां गंदगी फैलाने वाले तत्व मौजूद हों, बीमारियां भी अक्सर वही अपने पांव पसारा करती हैं।

इसके विपरीत, जहां सफाई होती है वहां भयानक बीमारियों के पनपने के संयोग आश्चर्यजनक रूप से कम हो जाते हैं। इसलिए प्रदूषण की रोकथाम के लिए सबसे पहले हमें प्रदूषण पैदा करने वाले पदार्थ और तत्वों से दूरी बनानी होगी।

औद्योगिकरण का सहारा लेकर दौलत कमाने की धुन ने कुछ लोगों को अंधा बना दिया है और बीमारियों के इन खतरनाक स्रोतों से इतना करीब कर दिया है कि इनकी भयावहता से परिचित होने के बावजूद वे प्रदूषण को अपनी बेशकीमत सेहत पर महत्व देने लगे हैं। कल कारखानों से निकलने वाले गाढ़े काले पदार्थ लगातार हमारी धरती में जज्ब हो रहे हैं जिसके नतीजे में पृथ्वी का गर्भ जहरीले पदार्थों से भर रहा है।

यही कारण है कि जल प्रदूषण अपने पांव पसार कर इंसानों के शरीर में भी गड़बड़ी मचा रहा है जिसके चलते हम हर नए दिन हम अजनबी, अत्यंत गंभीर और असाध्य बीमारियों के शिकंजे में फंसते चले जा रहे हैं। विश्व की कुछ प्रकृति प्रेमी संस्थाओं के लिए प्रदूषण हमेशा से ही गहरी चिंता का विषय रहा है। यह संस्थाएं प्रदूषण की रोकथाम और लोगों की गफलत दूर करने के लिए जनहित में बहुत से जागरूकता अभियान भी चलाती रही हैं।

इस जागरूकता अभियान में लोगों को गंदगी के प्रति खबरदार किया जाता है और उन्हें यह बताया जाता है कि जहरीले पदार्थ या तत्व खतरनाक तो हैं लेकिन उन्हें दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाया जा सकता है।

पर्यावरण के सिलसिले में बुद्धिजीवियों की राय

पर्यावरण विद्या के ज्यादातर जानकार तो आम लोगों को यही मशवरा देते चले आ रहे हैं कि प्रदूषण को काबू करने का सीधा और सरल उपाय बस यही है कि मानव प्रजाति को अपनी फितरत में बदलाव लाकर कुदरत के करीब जाना होगा।

इसके लिए उन्हें बड़ी मात्रा में घने और ऑक्सीजन युक्त पेड़ों को अपनी जड़ें मजबूत करने का मौका देना होगा, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और प्राकृतिक संपदा का बेहतर ढंग से रख रखाव करना होगा। इसके अलावा ऐसे इलाके जहां जनसंख्या ज्यादा हो, उन्हें हरियाली से ओतप्रोत खुला एवं हवादार रखना होगा।

कल कारखानों की स्थापना आबादी से बहुत दूर स्थानों पर करनी होगी। बुद्धिजीवियों की राय यह भी है पर्यावरण और विकास जैसे दो महत्वपूर्ण विषयों को एक ही रथ में सवार करके अपने साथ लेकर चलना होगा क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि केवल अपने स्वार्थ के लिए विकास का रास्ता अपनाकर इंसान पर्यावरण का विनाश करता है। इस तरह वह स्वयं अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रहा है।

व्यक्तिगत रूप से अगर दुनिया का हर नागरिक पर्यावरण संरक्षण को लेकर जंगी पैमाने पर प्रयास शुरू कर दे तो पर्यावरण संरक्षण के लिए इससे बेहतर माध्यम कुछ और हो ही नहीं सकता।

मानव को विकास और पर्यावरण दोनों को साथ लेकर चलना होगा

किसी भी समस्या के समाधान के लिए हल और उपाय तो इतने होते हैं कि कभी कभार उन्हें समेट कर कलम के ज़रिए काग़ज़ पर उतारना मुश्किल हो जाता है।

मनुष्य का स्वभाव लालची होता है। इसी लालच के चलते वह अपने स्वार्थ की पूर्ति करता है और उस पूर्ति के दौरान लालच के बुरे नतीजों की उसे कोई खास परवाह भी नहीं होती। यही हाल विकास के मुद्दे पर भी देखने में आया है। मानवों ने धरती के पर्यावरण का विनाश करके खूब विकास कर लिया।

इसके लिए उसने धरती के पेड़ों तक को नहीं बख्शा यहां तक कि उन्हें काट कर जमीन पर धराशाई कर दिया, जो पुराने ज़माने में कभी हमारे सबसे गहरे दोस्त समझे जाते थे। अब जब उसने अपने गहरे दोस्तों की ही ऐसी दुर्गति कर दी है तो भला और जीवों से वह कैसा बर्ताव करेगा, यह कोई रहस्य नहीं है!

मानव ने किस तरह अपनी स्वार्थ सिद्धि और विकास के लिए प्रकृति से खिलवाड़ किया है, यह भी सबके सामने है। हम चांद पर पहुंच गए और अब मंगल ग्रह पर जाने की तैयारियां भी जोर शोर से चल रही हैं लेकिन जमीन पर हालात इतने कठोर और सख़्त हो चुके हैं, मगर जाने क्यों इंसान अपनी आने वाली पीढ़ियों को भूलकर अपनी ही स्वार्थ सिद्धि में लगा हुआ है।

उसे धरती के अन्य जीवों की कोई फिक्र नहीं है। यहां तक की इंसानों की भी नहीं तभी तो वह युद्ध करने से भी कभी नहीं घबराता और हिंसा एवं अराजकता के माध्यम से विनाश की ओर अपने कदम बढ़ाता रहता है।

यदि हमें इन परिस्थितियों से निजात पानी है तो आज से ही दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेना होगा और स्वयं को इस धरती का उत्तराधिकारी मानकर उसकी रक्षा सुरक्षा की जिम्मेदारी व्यक्तिगत एवं संयुक्त रूप से उठानी पड़ेगी।

क्योंकि विकास का बहाना बनाकर प्रकृति के साथ खिलवाड़ दूरदर्शिता नहीं बल्कि बेवकूफी है

Exit mobile version