चाणक्य नीति Chapter 17 में आचार्य चाणक्य ने ज्ञान, गुरु, कर्म, दान, मधुर वाणी, संगति, धर्म, आत्मसंयम और जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण विचार बताए हैं। इस अध्याय में व्यक्ति के व्यवहार और उसके कर्मों को विशेष महत्व दिया गया है।
चाणक्य भारत के महान विद्वानों में से एक माने जाते हैं। मौर्य साम्राज्य के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। वे कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्र के विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हैं।
चाणक्य की नीतियों में केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन, व्यवहार, ज्ञान और समाज से जुड़े विचार भी मिलते हैं। हालांकि, इस अध्याय के कुछ कथन प्राचीन सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसलिए उन्हें उसी ऐतिहासिक संदर्भ के साथ समझना उचित है।
इससे पहले आप चाणक्य नीति Chapter 16 भी पढ़ सकते हैं। अब आइए जानते हैं चाणक्य नीति सप्तदश अध्याय के महत्वपूर्ण विचार।
चाणक्य नीति Chapter 17
1. गुरु के मार्गदर्शन में प्राप्त ज्ञान का महत्व
जिस प्रकार परपुरुष से गर्भ धारण करने वाली व्यभिचारिणी स्त्री को मूल नीति में सामाजिक सम्मान से वंचित बताया गया है, उसी प्रकार बिना गुरु के सानिध्य के विद्या ग्रहण करने वाले व्यक्ति को विद्वानों की सभा में उपहास का पात्र बताया गया है।
चाणक्य नीति में यह विचार दिया गया है कि केवल असंख्य किताबों का अध्ययन कर लेना पर्याप्त नहीं है। गुरु का मार्गदर्शन ज्ञान को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण माना गया है।
The scholar who has acquired knowledge by studying innumerable books without the blessings of a bonafide spiritual master does not shine in an assembly of truly learned men just as an illegitimate child is not honored in society.
सीख: किताबों से ज्ञान प्राप्त करना महत्वपूर्ण है, लेकिन सही मार्गदर्शन, अभ्यास और समझ उस ज्ञान को अधिक उपयोगी बनाते हैं।
नोट: मूल कथन में विवाह और संतान से जुड़ी पुरानी सामाजिक तुलना है। इसे आज के सामाजिक या नैतिक नियम के रूप में नहीं, बल्कि उस समय की सोच के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
2. उपकार का बदला उपकार से और बुराई का सामना समझदारी से
जो हमारी मदद करता है, हमें भी उसकी मदद करनी चाहिए। मूल नीति में जो हमारे साथ हिंसा करता है, उसके साथ उसी प्रकार व्यवहार करने की बात कही गई है और इसे “जैसे को तैसा” व्यवहार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
We should repay the favors of others by acts of kindness; so also should we return evil for evil in which there is no sin, for it is necessary to pay a wicked man in his own coin.
आज की सीख: उपकार का बदला उपकार से करना सकारात्मक है। लेकिन वास्तविक जीवन में हिंसा का जवाब हिंसा से देना हमेशा उचित नहीं होता। कानून, संयम और सुरक्षित समाधान को प्राथमिकता देना बेहतर है।
3. कठिन लक्ष्य भी प्रयास से प्राप्त किए जा सकते हैं
जो चीज दूर दिखाई देती है, असंभव लगती है या हमारी पहुंच से बाहर दिखाई देती है, वह भी तप और लगातार प्रयास से प्राप्त की जा सकती है, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है। तप को अत्यंत शक्तिशाली साधन बताया गया है।
That thing which is distant, that thing which appears impossible, and that which is far beyond our reach, can be easily attained through tapasya, for nothing can surpass austerity.
सीख: बड़े लक्ष्य के लिए निरंतर प्रयास, अनुशासन और धैर्य जरूरी हैं।
4. लोभ और परनिंदा से बचना चाहिए
लोभ से बड़ा दुर्गुण क्या हो सकता है? परनिंदा से बड़ा पाप क्या है? जो सत्य में स्थापित है, उसे तप करने की क्या आवश्यकता है? जिसका हृदय शुद्ध है, उसे तीर्थयात्रा की क्या जरूरत है?
यदि स्वभाव अच्छा है तो और किस गुण की आवश्यकता है? यदि कीर्ति है तो अलंकार की क्या जरूरत है? यदि व्यवहार ज्ञान है तो दौलत की क्या जरूरत है? और यदि व्यक्ति अपयश या अपमानित है तो मृत्यु से बड़ी पीड़ा क्या हो सकती है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
What vice could be worse than covetousness? What is more sinful than slander? For one who is truthful, what need is there for austerity? For one who has a clean heart, what is the need for pilgrimage? If one has a good disposition, what other virtue is needed? If a man has fame, what is the value of other ornamentation? What need is there for wealth for the man of practical knowledge? And if a man is dishonored, what could there be worse than death?
सीख: लोभ और परनिंदा से बचना तथा सत्य, अच्छे स्वभाव और सही व्यवहार को महत्व देना जीवन को बेहतर बना सकता है।
5. दान से यश और कल्याण का विचार
उच्च कुल में उत्पन्न और गुण-संपन्न व्यक्ति भी यदि दान नहीं करता, तो उसे जीवन में यश नहीं मिलता। अतः इस लोक में यश और सुख तथा पारलौकिक कल्याण के लिए दान को सर्वोत्तम साधनों में से एक बताया गया है।
उदाहरण के रूप में समुद्र, शंख और देवी लक्ष्मी का उल्लेख किया गया है। समुद्र रत्नों का भंडार है और लक्ष्मी शंख की बहन मानी जाती हैं, फिर भी शंख भिक्षा मांगने वाले के हाथ में होता है।
Though the sea, which is the reservoir of all jewels, is the father of the conch shell, and the Goddess of fortune Lakshmi is conch’s sister, still the conch must go from door to door for alms. It is true, therefore, that one gains nothing without having given in the past.
सीख: दान को केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि जरूरतमंद की सहायता और अच्छे उद्देश्य से जोड़कर देखना चाहिए।
6. स्वभाव बदलने में समय लग सकता है
शक्तिहीन पुरुष प्रायः ब्रह्मचारी बन जाता है और निर्धन तथा आजीविका कमाने में अयोग्य व्यक्ति साधु बन जाता है। इसी प्रकार असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति देवों का भक्त बन जाता है और बूढ़ी स्त्री पतिव्रता बन जाती है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
When a man has no strength left in him he becomes a sadhu, one without wealth acts like a brahmachari, a sick man behaves like a devotee of the Lord, and when a woman grows old she becomes devoted to her husband.
नोट: यह प्राचीन सामाजिक सोच पर आधारित सामान्यीकृत कथन है। इसे किसी व्यक्ति के वास्तविक चरित्र या धार्मिकता का सार्वभौमिक मापदंड नहीं माना जाना चाहिए।
7. अन्न और जल का दान श्रेष्ठ माना गया है
अन्न और जल का दान अप्रतिम दान बताया गया है। भूखे को भोजन करा देना और प्यासे को पानी पिला देना जैसा कोई दूसरा दान नहीं माना गया है।
द्वादशी जैसी तिथि और गायत्री मंत्र के महत्व का भी उल्लेख किया गया है। इसके बाद सांप, कीड़े और बिच्छू के विष के उदाहरण से दुष्ट व्यक्ति को पूर्ण रूप से विष से भरा हुआ बताया गया है।
There is poison in the fang of the serpent, in the mouth of the fly, and in the sting of a scorpion; but the wicked man is saturated with it.
सीख: भूखे और प्यासे व्यक्ति की मूल जरूरत पूरी करना मानवता और सहायता की महत्वपूर्ण भावना है।
8. पत्नी के व्रत और पति की अनुमति वाला प्राचीन कथन
मूल चाणक्य नीति में कहा गया है कि जो स्त्री अपने पति की सम्मति के बिना व्रत रखती और उपवास करती है, वह उसकी आयु घटाती है और स्वयं नरक में जाती है।
The woman who fasts and observes religious vows without the permission of her husband shortens his life and goes to hell.
नोट: यह प्राचीन धार्मिक और पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था का कथन है। आज किसी वयस्क व्यक्ति के धार्मिक अभ्यास के लिए ऐसी सामान्य अनुमति-व्यवस्था को सार्वभौमिक नियम नहीं माना जाता।
9. स्त्री की धार्मिक शुद्धता के बारे में प्राचीन विचार
मूल नीति में कहा गया है कि स्त्री न तो दान देने से, न उपवास से और न ही अनेक तीर्थों का सेवन करने से शुद्ध होती है, बल्कि पति के चरणों का श्रद्धापूर्वक स्पर्श करने से शुद्ध होती है।
A woman does not become holy by offering by charity, by observing hundreds of fasts, or by sipping sacred water, as by sipping the water used to wash her husband’s feet.
नोट: यह प्राचीन धार्मिक-सामाजिक मान्यता है। इसे आज महिलाओं की धार्मिक या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में तथ्य या नियम के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
10. अशुद्ध जल के बारे में कथन
पैर धोने से बचा हुआ या पीने के बाद बचा हुआ जूठा जल तथा संध्या करने से बचा हुआ जल अग्रहणीय बताया गया है। मूल नीति में ऐसे जल को रोगों का कारण कहा गया है।
नोट: बचे हुए या दूषित पानी के सेवन से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम हो सकते हैं, लेकिन इस मूल कथन की भाषा प्राचीन संदर्भ की है।
11. दान, स्नान, सम्मान और आध्यात्मिक ज्ञान का महत्व
एक हाथ की शोभा गहनों से नहीं, बल्कि दान देने से है। निर्मलता चंदन का लेप लगाने से नहीं, बल्कि जल से स्नान करने से आती है। एक व्यक्ति केवल भोजन खिलाने से नहीं, बल्कि सम्मान देने से संतुष्ट होता है। मुक्ति स्वयं को सजाने से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान को जगाने से होती है।
The hand is not so well adorned by ornaments as by charitable offerings; one does not become clean by smearing sandalwood paste upon the body as by taking a bath; one does not become so much satisfied by dinner as by having respect shown to him, and salvation is not attained by self-adornment as by cultivation of spiritual knowledge.
सीख: बाहरी सजावट से अधिक महत्वपूर्ण अच्छा व्यवहार, दान, स्वच्छता और ज्ञान को माना गया है।
12. बाहरी संपन्नता हमेशा सम्मान की गारंटी नहीं
नाई के घर जाकर हजामत करवाने वाला, पाषाण की देवमूर्तियों पर चंदन लगाने वाला तथा जल में अपना प्रतिबिंब देखने वाला व्यक्ति इन्द्र के समान संपन्न होने पर भी शोभाविहीन होता है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
यहां कुछ पुरानी सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख है। आज के संदर्भ में इसे व्यक्ति की बाहरी संपत्ति के बजाय उसके व्यवहार और आत्मसम्मान के महत्व से जोड़कर समझना अधिक उपयोगी है।
13. औषधि और भोजन से जुड़ा प्राचीन स्वास्थ्य कथन
टुंडी फल खाने से आदमी की समझ खो जाती है और वच मूल खिलाने से लौट आती है। इसी प्रकार स्त्री के साथ संभोग करने से आदमी की शक्ति खो जाती है और दूध पीने से वापस आती है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
The eating of tundi fruit deprives a man of his sense, while the vacha root administered revives his reasoning immediately. A woman at once robs a man of his vigour while milk at once restores it.
नोट: ये प्राचीन स्वास्थ्य-संबंधी मान्यताएं हैं। इन्हें आधुनिक चिकित्सा या nutrition science के प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।
14. परोपकार की भावना व्यक्ति को मजबूत बनाती है
जिस व्यक्ति के हृदय में सभी जीवों के प्रति परोपकार की भावना होती है, वह सभी संकटों पर विजय प्राप्त करता है और उसे हर कदम पर सभी प्रकार की संपन्नता प्राप्त होती है, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है।
He who nurtures benevolence for all creatures within his heart overcomes all difficulties and will be the recipient of all types of riches at every step.
सीख: दूसरों की सहायता करने और भलाई की भावना रखने से व्यक्ति के संबंध और सामाजिक जीवन बेहतर हो सकते हैं।
15. सुखी गृहस्थ जीवन का वर्णन
जिस व्यक्ति की पत्नी प्रेमभाव रखने वाली और सदाचारी है, जिसके पास संपत्ति है, जिसका पुत्र सदाचारी और अच्छे गुणों वाला है और जिसके पुत्र से पौत्र हुए हैं, उसके लिए इंद्र के राज्य में जाकर भी क्या विशेष सुख मिलेगा, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
What is there to be enjoyed in the world of Lord Indra for one whose wife is loving and virtuous, who possesses wealth, who has a well-behaved son endowed with good qualities, and who has grandchildren born of his children?
आज की सीख: सुखी परिवार, अच्छे संबंध और आर्थिक स्थिरता व्यक्ति के जीवन में संतोष का कारण बन सकते हैं। हालांकि परिवार की खुशी केवल पत्नी, पुत्र या पौत्र होने पर निर्भर नहीं करती।
16. मनुष्य को पशुओं से अलग करने वाले गुण
खाना-पीना, निद्रा, डर और मैथुन जैसी क्रियाएं पशु और मनुष्यों में समान हैं। मनुष्यों को पशुओं से अलग करने वाला गुण धर्म और नैतिकता, तथा विवेकपूर्ण ज्ञान बताया गया है।
Men have eating, sleeping, fearing, and mating in common with the lower animals. That in which men excel the beasts is discretionary knowledge; hence, indiscreet men who are without knowledge should be regarded as beasts.
सीख: मनुष्य की विशेषता केवल शारीरिक जरूरतों में नहीं, बल्कि विवेक, नैतिकता और सही निर्णय लेने की क्षमता में भी है।
17. धनवान व्यक्ति को जरूरतमंदों को निराश नहीं करना चाहिए
यदि मदमस्त हाथी अपने माथे से टपकने वाले रस को पीने वाले भौरों को कान हिलाकर उड़ा देता है, तो भौरों का कुछ नहीं जाता। वे कमल से भरे तालाब की ओर खुशी से चले जाते हैं। लेकिन हाथी के माथे का श्रृंगार कम हो जाता है।
इसी प्रकार धनी लोगों को याचकों को निराश करके वापस नहीं भेजना चाहिए, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है।
If the bees that seek the liquid oozing from the head of a lust-intoxicated elephant are driven away by the flapping of his ears, then the elephant has lost only the ornament of his head. The bees are quite happy in the lotus filled lake.
सीख: जिसके पास संसाधन हैं, उसे अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए।
18. दूसरों का दुःख कौन नहीं समझ पाता?
मूल चाणक्य नीति में आठ ऐसे लोगों का उल्लेख है जिन्हें दूसरों का दुःख समझने में असमर्थ बताया गया है:
- राजा
- वेश्या
- यमराज
- अग्नि
- चोर
- छोटा बच्चा
- भिखारी
- कर वसूल करने वाला
A king, a prostitute, Lord Yamaraja, fire, a thief, a young boy, and a beggar cannot understand the suffering of others. The eighth of this category is the tax collector.
नोट: यह प्राचीन और सामान्यीकृत कथन है। आज किसी पेशे, लिंग या सामाजिक स्थिति के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई व्यक्ति दूसरों की पीड़ा नहीं समझ सकता।
19. वृद्धावस्था का उपहास नहीं करना चाहिए
एक महिला से पूछा जाता है, “हे महिला, तुम नीचे झुककर क्या देख रही हो? क्या तुम्हारा कुछ जमीन पर गिर गया है?” वह उत्तर देती है, “हे मूर्ख, मेरे तारुण्य का मोती न जाने कहां फिसल गया।”
इस कथा के माध्यम से समझाया गया है कि समझदार व्यक्ति को किसी भी वृद्ध का उपहास नहीं करना चाहिए, क्योंकि वृद्धावस्था एक दिन सभी को आनी है।
O lady, why are you gazing downward? Has something of yours fallen on the ground? She replies: O fool, can you not understand the pearl of my youth has slipped away?
सीख: उम्र बढ़ने का सम्मान करना चाहिए और किसी व्यक्ति की उम्र या शारीरिक बदलाव का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।
20. एक अच्छाई कई कमियों पर भारी पड़ सकती है
हे केतकी पुष्प! तुझमें सांप लिपटे रहते हैं, फल भी नहीं लगते, कांटे बहुत हैं और सुगंध भी हर जगह आसानी से नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त तुम कीचड़ में पैदा होते हो और आसानी से प्राप्त भी नहीं होते।
लेकिन तुम्हारी विशेष सुगंध के कारण तुम फिर भी सभी को प्रिय हो। इसी प्रकार व्यक्ति की एक बड़ी अच्छाई अनेक बुराइयों पर भारी पड़ सकती है, ऐसा इस उदाहरण के माध्यम से समझाया गया है।
O Pandanus tree! you have snakes all over you, you don’t bear any fruit, and are infested with thorns. You grow in mud and are quite rare to find. How come your peculiar smell attracts everyone? A man with quality is likely to get acceptance despite being in bad condition.
सीख: किसी व्यक्ति का एक अच्छा गुण भी उसके व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
21. यौवन, धन और अधिकार में विनम्रता जरूरी है
यौवन, धन-संपत्ति, अधिकार और स्वामित्व तथा विवेकहीनता मानव को अनर्थ की ओर प्रेरित कर सकते हैं। इन्हें पाकर मनुष्य को विनम्र और सावधान रहना चाहिए। यदि मनुष्य विवेक का पल्ला छोड़ देता है, तो उसका विनाश होने में एक पल भी नहीं लगता।
सीख: युवा अवस्था, धन और अधिकार मिलने पर अहंकार करने के बजाय विवेक और विनम्रता बनाए रखनी चाहिए।
चाणक्य नीति Chapter 17 की प्रमुख सीख
चाणक्य नीति Chapter 17 में ज्ञान, गुरु, कर्म, दान, वाणी, संगति, धर्म और व्यवहार से जुड़ी अनेक बातें कही गई हैं। इनमें से कुछ सीख आज भी उपयोगी रूप में समझी जा सकती हैं।
- गुरु और शिक्षक के मार्गदर्शन का सम्मान करें।
- ज्ञान को केवल किताबों तक सीमित न रखें।
- बड़े लक्ष्य के लिए धैर्य और निरंतर प्रयास करें।
- लोभ और परनिंदा से बचें।
- धन का उपयोग जरूरतमंदों की सहायता में करें।
- मधुर वाणी और अच्छे व्यवहार को महत्व दें।
- अपनी सफलता और संपत्ति का अहंकार न करें।
- वृद्ध लोगों का सम्मान करें।
- सभी जीवों के प्रति दया और परोपकार की भावना रखें।
- अपनी विवेकशीलता और निर्णय क्षमता को मजबूत करें।
- प्राचीन नीतियों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में समझें।
चाणक्य नीति Chapter 17 से आज क्या सीखें?
इस अध्याय की कई बातें आज के जीवन में भी आसानी से समझी जा सकती हैं। ज्ञान प्राप्त करने के साथ उसे व्यवहार में उतारना जरूरी है। बड़े लक्ष्य के लिए लगातार प्रयास करना भी महत्वपूर्ण है।
इसी तरह, धन और अधिकार मिलने के बाद विनम्र रहना, अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना और दूसरों की सहायता करना व्यक्ति के चरित्र को मजबूत बना सकता है।
दूसरी ओर, इस अध्याय के कुछ विचार प्राचीन धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था पर आधारित हैं। इसलिए स्त्री, सामाजिक भूमिका, धार्मिक नियम और कर्मफल से जुड़े पुराने कथनों को आज के समाज का सार्वभौमिक नियम मानना उचित नहीं होगा।
व्यक्तित्व और आत्मनिरीक्षण से जुड़ी सीख के लिए आप आत्मनिरीक्षण करो, अन्य को दोष मत दो भी पढ़ सकते हैं।
सफलता और अच्छे जीवन से जुड़े विचारों के लिए सफल लोग क्या अलग करते हैं? भी पढ़ सकते हैं।
चाणक्य नीति के अन्य अध्याय पढ़ें
अगर आपको चाणक्य नीति Chapter 17 के ये विचार पसंद आए हैं, तो आप इसके दूसरे अध्याय भी पढ़ सकते हैं:
- चाणक्य नीति Chapter 12 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 13 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 14 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 15 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 16 In Hindi
आप सम्पूर्ण चाणक्य नीति हिंदी में भी पढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष
चाणक्य नीति Chapter 17 इस श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें ज्ञान, गुरु, दान, अच्छे गुण, मधुर वाणी, परोपकार, विनम्रता और विवेक जैसे विषयों पर विचार मिलते हैं।
इस अध्याय से यह सीख मिलती है कि व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करके उसे अपने व्यवहार में उतारना चाहिए। धन, यौवन और अधिकार मिलने पर अहंकार नहीं करना चाहिए। जरूरतमंदों की सहायता, मधुर वाणी और दूसरों के प्रति सम्मान भी अच्छे जीवन का हिस्सा हो सकते हैं।
साथ ही, इस अध्याय के कुछ कथन प्राचीन सामाजिक और धार्मिक सोच से जुड़े हैं। इसलिए उन्हें आज के समय में बिना संदर्भ के लागू करने के बजाय उनके मूल विचार और ऐतिहासिक संदर्भ को समझना अधिक उचित है।
अंततः चाणक्य नीति का अध्ययन तभी अधिक उपयोगी बनता है जब हम उसकी सीख को विवेक के साथ समझें और वर्तमान जीवन में जो बातें उचित तथा उपयोगी हों, उन्हें अपने आचरण में शामिल करें।
Note: सावधानी बरतने के बावजूद यदि ऊपर दिए गए किसी भी Quote (Hindi or English) में आपको कोई त्रुटि मिले तो कृपया comments के माध्यम से अवगत कराएं।
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