Chanakya Niti In Hindi चाणक्य नीति : Chapter 1

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Chanakya Neeti, चाणक्य Quotes in Hindi | चाणक्य नीति : Chapter 1 | Complete Chanakya Niti in Hindi

मुर्ख शिष्य को उपदेश देने, दुष्ट और कुलटा स्त्री के भरण-पोषण करने तथा दुखी व्यक्तियों के संग में रहने से बुद्धिमान व्यक्ति को भी कष्ट हो सकता हैं यहाँ चाणक्य ने यह स्पष्ट किया है की मुर्ख शिष्य को भली बात के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए इसी प्रकार दुष्ट आचरण वाली स्त्री का संग करना भी अनुचित हैं और दुखी व्यक्तियों के पास बैठने-उठने समागम से ज्ञानवान पुरुषो को भी दुःख उठाना पड़ सकता है

जिस व्यक्ति को किसी भी बात का कोई ज्ञान नहीं है, उसे कोई बात आसानी से समझाई जा सकती हैं और जो व्यक्ति सब कुछ जानता हो, चतुर हो उसे भी कोई भी बात बहुत ही सफलतापूर्वक समझाई जा सकती हैं, परन्तु जिस व्यक्ति को बहुत थोडा सा ज्ञान होता हैं उसे तो ब्रह्मा भी नहीं समझा सकता क्यों कि यह बात बिल्कुल उस तरह होती हैं जैसे एक कहावत के अनुसार चूहा हल्दी की एक गांठ लेकर पंसारी बन बैठा

दुखी व्यक्ति का संसर्ग नहीं करना चाहिए क्यों कि दुःख कभी भी अकेला नहीं आता जिस प्रकार कोई व्यक्ति यदि फटा हुआ कपडा ओढ़ कर सोता हैं तो पैर अथवा हाथ लगने से वह कपडा और भी फटता जाता हैं इस प्रकार दुखो के सागर में फंसा व्यक्ति आसानी से उनसे पार नहीं निकलता

जिस व्यक्ति कि स्त्री दुष्ट हो, जिसके मित्र नीच स्वभाव के हों और नौकर चाकर जबाब देने वाले हो और जिस घर में सांप रहता हो, ऐसे घर में रहने वाला व्यक्ति निश्चय ही मृत्यु के निकट रहता है

 

मनुष्य को विपति के समय के लिए धन बचाना और संचित करना चाहिए, परन्तु धन के बदले यदि औरतो की रक्षा करनी पड़े तो धन को खर्च कर देना जरुरी है चाणक्य कहते है कि यदि व्यक्ति को अपनी रक्षा के लिए इन दोनों चीजो का भी बलिदान करना पड़े तो इनका बलिदान करने से नहीं चूकना चाहिए

व्यक्ति को किसी संकट से बचने के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए धन जमा करना चाहिए, क्योंकि धन अथवा लक्ष्मी को चंचल माना गया है उसके सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता कि वह कब नष्ट हो जायेगी, परन्तु प्रारंभ की बात पर यह प्रश्न उठता हैं कि यदि आदमी विपति के लिए धन का संचय करता हैं, दुःख से बचने के लिए धन बचाता है तो उसे दुःख प्राप्त होने की संभावना ही कहां रह जाती हैं

जिस देश में व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलता और आजीविका के साधन भी सुलभ न हों, जहां उसके परिवार के लोग और मित्र आदि भी न हो, उस देश में रहना उचित नहीं हैं इसके साथ ही चाणक्य ने यह महत्वपूर्ण बात भी कही हैं कि यही ऐसे देश में विद्या-प्राप्ति के साधन भी न हो तो उस देश में मनुष्य को भी नहीं रहना चाहिए वंहा कभी वास करना चाहिए

जिस देश में धनी-मानी व्यापारी, कर्म कांड को मानने वाले पुरोहित ब्राहमण, शासन व्यस्था में निपुण राजा, सिंचाई अथवा जल की आपूर्ति के लिए नदियां और रोगों से रक्षा के लिए वैध आदि चिकित्सक न हों अथार्त जहां पर ये पांचो सुविधांए प्राप्त न हो वहां व्यक्ति को एक दिन के लिए भी रहना उचित नहीं हैं

मुनष्य को ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहिए जहां लोगो का लोक और परलोक की प्रति अथवा ईश्वर की विधमानता में कोई भरोसा न हो उन्हें किसी प्रकार के कर्म में लज्जा अथवा भय नहीं हो जहां के लोग चतुर न हो, उनमें त्याग करने की भावना न हो

यहाँ चाणक्य बन्धु-बान्धवों, मित्रो और परिजनों की पहचान बताते हुए कहते हैं की जब व्यक्ति को कोई असाध्य रोग घेर लेता हैं, जब वह किसी बुरी लत में पड़ जाता हैं अथवा उसे खाने-पीने की चीजो का आभाव हो जाता है, वह अकाल का ग्रास बन जाता है, उस पर किसी प्रकार का शत्रु आक्रमण करता हैं, राजा और सरकार की ओर से उस पर कोई case अथवा अभियोग लगाया जाता हैं और जब वह अपने किसी प्रियजन को उसकी मुर्त्यु पर श्मशान-भूमि ले जाता हैं, ऐसे समय में जो लोग उसका साथ देते हैं, वही वास्तव में उसके बन्धु-बान्धव होते हैं

जो व्यक्ति अनिश्चित पदार्थो की कामना करके उनके पीछे भागता हैं उसका फल यही होता है कि अनिश्चित वस्तुओ का तो मिलना असंभव होता ही हैं, परन्तु निश्चित वस्तु लिए प्रयत्न न करने के कारण वह भी हाथ से निकल जाती हैं

बुद्धिमान व्यक्ति को कुलीन घर की कन्या से ही विवाह करना चाहिए, उसे सोंदर्य के पीछे नहीं भागना चाहिए कुलीन घर की कन्या का रूप भले ही सामान्य हो, परन्तु व्यक्ति को अपना सम्बन्ध कुलीन घराने की कन्या से ही करना चाहिए इसके विपरीत नीच कुल की सुन्दर कन्या से केवल उसका रूप देखकर सम्बन्ध स्थापित करना उचित नहीं

लम्बे नाख़ून वाले हिंसक पशुओ, नदियों, बड़े बड़े सींग वाले पशुओ, शस्त्रधारियो, स्त्रियों और राज-परिवारों का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए

यदि विष में भी अमृत की प्राप्ति होती हैं तो उसको ग्रहण कर लेना चाहिए,उसका परित्याग नहीं करना चाहिए इसी प्रकार यही किसी गन्दी जगह सोना आदि मूल्यवान वस्तु पड़ी हो तो उसको उठा लेना चाहिए, अथार्थ यदि किसी नीच व्यक्ति के पास अच्छी विधा हैं अच्छा गुण हैं तो उसको ग्रहण करने में संकोच नहीं करना चाहिए और कोई नीच कुल की शालीन स्त्री अच्छे गुण से युक्त हैं तो उसको ग्रहण करने में कोई हानि नहीं हैं

स्त्रियां पुरुषो से दोगुना अधिक भोजन करती हैं इसके साथ ही चाणक्य का यह भी कहना हैं कि स्त्रियों में लज्जा पुरुष की अपेक्षा चार गुणा अधिक होती हैं यही कारण हैं कि आदमी उनके मन की कोई बात समझने में कभी पूर्णतया समर्थ नहीं होता वह कितना ही प्रयत्न करे स्त्रिया कभी भी खुलकर अपने मन की बात नहीं बताती, स्त्रिया में साहस आदमियों की  अपेक्षा छह गुणा अधिक होता हैं तथा उसमे कामवासना आठ गुणा अधिक होती हैं

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Note: यदि ऊपर दिए गए किसी भी Quote में मेरे द्वारा कोई त्रुटि रह गई हो तो माफ़ करना

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Mahesh Yadav is a software developer by profession and like to posts motivational and inspirational Hindi Posts, before that he had completed BE and MBA in Operations Research. He have vast experience in software programming & development.

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