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जगतगुरु आदि शंकराचार्य की जीवनी | Adi Shankaracharya Biography

Sri Adi Shankaracharya Biography in Hindi

कौन है आदि शंकराचार्य? उन्होंने समस्त मनुष्य जाति का मार्गदर्शन करने के लिए कौन से कार्य किए और क्यों वह हम सभी के बीच आज भी इतने प्रसिद्ध हैं। जिनके बारे में हमें किताबों में पढ़ाया जाता है अगर आप आदि शंकराचार्य के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो आज हम इस लेख में आदि शंकराचार्य की जीवनी लेकर आए है।

आदि शंकराचार्य के महान कर्मों की वजह से आज भी भारतीय संस्कृति में बड़े सम्मान से लोग उनका नाम लेते हैं। आस्था के प्रति उनके विचार और उनके द्वारा लोगों का किया गया मार्गदर्शन शब्दों में बयां करना अत्यंत कठिन है।

आदि शंकराचार्य व्यक्तिगत परिचय

जन्म 788 ई.
मृत्यु 820 ई.
जन्मस्थान केरल के कलादी ग्राम मे
पिता श्री शिवागुरू
माता श्रीमति अर्याम्बा
गुरु गोविंदाभागवात्पद
प्रमुख उपन्यास अद्वैत वेदांत
जाति नाबूदरी ब्राह्मण
धर्म हिन्दू
राष्ट्रीयता भारतीय
भाषा संस्कृत,हिन्दी

आदि शंकराचार्य प्रारंभिक जीवन

गांव कलादी, राज्य केरल, देश भारत में सन 788 में जगतगुरू आदि शंकराचार्य जी पैदा हुए थे। आदि शंकराचार्य जी के पैदा होने की कथा भी बड़ी रोचक है, जिसके अनुसार आदि शंकराचार्य के जो माता-पिता थे़ उन्हें लंबे समय तक कोई संतान नहीं थी, जिसके बाद आदि शंकराचार्य की माता ने भगवान शंकर की कड़ी तपस्या की और आदि शंकराचार्य की माता जी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए।

और शंकर भगवान ने आदि शंकराचार्य जी की माता से कहा कि पहले बेटे के रूप में वह खुद ही पैदा होंगे, परंतु उनकी उम्र बहुत ही कम होगी और इसीलिए वह जल्दी से वापस देवलोक चले जाएंगे।

शंकराचार्य जी बहुत ही गंभीर और शांत स्वभाव के थे। आदि शंकराचार्य जी की याददाश्त इतनी तेज थी कि यह जो कुछ भी एक बार पढ़ते थे या फिर सुनते थे, उन्हें वह लंबे समय तक याद रहता था, क्योंकि इनकी याददाश्त शक्ति बहुत ही तेज थी।

आदि शंकराचार्य जी का परिवार

श्री आदि शंकराचार्य जी के पिताजी को शिव गुरु नाम से पुकारा जाता था, वही श्री आदि शंकराचार्य जी की माता जी का नाम आर्यम्बा था।

आदि शंकराचार्य जी का धर्म

आदि शंकराचार्य जी हिंदू धर्म के नाबूधारी ब्राह्मण समुदाय से संबंध रखते थे। इन्होंने हिंदू धर्म को भारत भर में फैलाने में और हिंदू धर्म का प्रचार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

आदि शंकराचार्य जी की शिक्षा

आदि शंकराचार्य ने अपने घर के पास स्थित गुरुकुल से सभी प्रकार के वेद और कुल 6 से भी ज्यादा वेदांतो में पारंगत हासिल कर ली थी। समय बढ़ने के साथ-साथ आदि शंकराचार्य जी के ज्ञान में भी बढ़ोतरी होती गई और उन्होंने अपने ज्ञान को अलग-अलग मठ की स्थापना करके विभिन्न प्रकार के ग्रंथों की रचना करके और लोगों को उपदेश देकर फैलाने का काम किया।

आदि शंकराचार्य जी और योग का महत्व

योग का महत्व बताने वाले आदि शंकराचार्य ही पहले व्यक्ति थे। इसके अलावा ईश्वर से किस प्रकार से जुड़ा जा सकता है, इसके बारे में भी आदि शंकराचार्य ने हीं लोगों को बताया।

आदि शंकराचार्य ने खुद कई संप्रदायों की गहराई से अध्ययन किया था और बाद में उन संप्रदायों के बारे में लोगों को परिचित करवाया।

आदि शंकराचार्य जी की जीवन शैली

आदि शंकराचार्य जी बचपन से ही एक अलग ही प्रकार की जीवन शैली जीते थे। शंकराचार्य जी ही वह व्यक्ति थे़ जिन्होंने वेदों और उपनिषदों के ज्ञान और उनके संदेश को पूरे भारत भर में फैलाने का काम किया।

आदि शंकराचार्य जी भगवान की दिव्यता से लोगों को परिचित करवाने का काम करते थे। भगवान के प्रचार के दरमियां आदि शंकराचार्य जी ने कभी किसी भी देवता या देवी के महत्व को कम नहीं बताया, ना हीं इन्होंने किसी भी देवी या फिर देवता की महानता को कम बताया।

आदि शंकराचार्य जी ने अपनी जीवन शैली के द्वारा मुख्यतया तीन वास्तविक स्तर पर लोगों को परिचित करवाया।

तीन वास्तविक स्तर

  1. प्रभु ~ भगवान ब्रह्मा, भगवान शंकर और भगवान विष्णु जी की शक्तियों का वर्णन आदि शंकराचार्य जी ने इस स्तर में बताया था
  2. प्राणी ~ इस स्तर में व्यक्ति की खुद की आत्मा- मन के महत्व का वर्णन आदि शंकराचार्य जी ने किया।
  3. अन्य ~ आदि शंकराचार्य जी ने इस लेवल में प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करने के साथ ही सभी प्रकार के पेड़ पौधे तथा जीव जंतु की महत्वता को बताया था।

जगतगुरू आदि शंकराचार्य जी का कार्यकाल

काफी कम उम्र में ही आदि शंकराचार्य ने अपने काम के द्वारा अपनी जिंदगी के लगभग तमाम उद्देश्यों को पूरा कर लिया था।

लोक मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि, सिर्फ 3 साल की उम्र में ही आदि शंकराचार्य जी ने वेद और शास्त्रों की स्टडी कर ली थी और इन्हें 3 साल की उम्र में ही शास्त्र और वेद पूरी तरह से याद हो गए थे।

आदि शंकराचार्य जी और हिंदू धर्म

आदि शंकराचार्य जी ने काफी कम उम्र में ही पूरे देश का भ्रमण कर लिया था और देश के भ्रमण के दौरान उन्होंने पूरे हिंदू समाज को एक करने का काफी प्रयास किया और इसमें इन्होंने काफी सफलता भी प्राप्त की थी।

आदि शंकराचार्य जी और उनके मठ

आदि शंकराचार्य जी ने टोटल चार प्रकार के विभिन्न मठों की स्थापना की, उन मठों को स्थापित करने के पीछे उनका उद्देश्य क्या है, इसके बारे में भी लोगों को बताया, जिसके कारण आदि शंकराचार्य जी को जगतगुरु की उपाधि दी गई।

चारों अलग-अलग प्रकार के मठों के मुख्य गुरु के तौर पर आदि शंकराचार्य जी की पूजा की जाती है।

जगतगुरु शंकराचार्य जी के चारों मठों के नाम

आदि शंकराचार्य जी ने विभिन्न प्रकार के चार मठों की स्थापना की थी, जो इस प्रकार है।

वेदान्त मठ

आदि शंकराचार्य जी ने वेदांत मठ को दक्षिण भारत में स्थापित किया था। इसे वेदांत ज्ञान मठ भी कहते हैं। शंकराचार्य जी के द्वारा स्थापित यह पहला मठ था।

गोवर्धन मठ

आदि शंकराचार्य जी ने दूसरा मठ पूर्वी भारत में स्थापित किया था। इसे जगन्नाथपुरी में स्थापित किया गया था।

शारदा मठ

कालिका मठ को ही शारदा मठ कहा जाता है,यह ऐसा तीसरा मठ था, जिसे शंकराचार्य जी ने पश्चिम भारत में स्थापित किया था। इस मठ को द्वारकाधीश में स्थापित किया गया था।

ज्योतिपीठ मठ

जगतगुरू आदि शंकराचार्य जी ने सबसे अंतिम और चौथा मठ उत्तर भारत में बद्रीनाथ में स्थापित किया था। इसे बद्रिकाश्रम भी कहते हैं।

जगतगुरू आदि शंकराचार्य जी ने चारों मठ की स्थापना करके भारत भर में हिंदू धर्म का प्रचार करने में काफी महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

जगतगुरू आदि शंकराचार्य जी के प्रमुख ग्रंथ

संस्कृत, हिंदी जैसी भाषाओं का यूज करके आदि शंकराचार्य जी ने 10 से भी ज्यादा शास्त्र, उपनिषद, गीता संस्करण और विभिन्न प्रकार के उपदेशों को भाषण के तौर पर और लेख के तौर पर लोगों के पास पहुंचाने का काम किया था।

अपनी जिंदगी में भगवान को बेहद खूबसूरती के साथ अपनी आत्मा और अपने मन से जोड़ने का काम आदि शंकराचार्य जी ने किया था और इन्हें जो भी अनुभव प्राप्त हुआ था, उन्होंने लोगों के साथ बांटा था।

आदि शंकराचार्य जी के मुख्य संदेश

अगर कोई व्यक्ति आदि शंकराचार्य जी के द्वारा दिए गए संदेश पर गंभीरता के साथ विचार करता है और उसे अपनी जिंदगी में उतारता है तो निश्चित ही वह अपनी जिंदगी को धन्य बना सकता है।

आदि शंकराचार्य जी के ऊपर अलग-अलग प्रकार के आर्टिकल और किताबें लिखी गई हैं, जिन्हें आप आसानी से इंटरनेट से या फिर बाजार से खरीद सकते हैं और शंकराचार्य जी के उद्देश्यों के बारे में और इनके संदेशों के बारे में इंफॉर्मेशन प्राप्त कर सकते हैं।

आदि शंकराचार्य जी की मृत्यु

मानव कल्याण का काम करने वाले आदि शंकराचार्य जी की मृत्यु स्थित सन 820 में हो गई थी। उस टाइम इनकी उम्र सिर्फ 32 साल थी और इन 32 सालों में उन्होंने मानव कल्याण के लिए कई काम किए थे।

आदि शंकराचार्य जी की मौत को लेकर अलग-अलग लोगों की विभिन्न राय है कई इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि आदि शंकराचार्य जी का निधन देश के तमिलनाडु राज्य के कांचीपुरम नाम की जगह पर हुआ था।

आदि शंकराचार्य जी की जयंती

नीचे हमने आपको अगले 7 सालों में आदि शंकराचार्य जी की जयंती कब पड़ रही है, उसकी इनफार्मेशन प्रदान की है।

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