• Business Ideas
  • Success Stories
  • व्यक्तित्व विकास
  • सफलता के रहस्य
  • Book Summary
  • Health Tips
Facebook Twitter Instagram LinkedIn Reddit RSS
Most Liked Posts
  • तेरे मेरे इर्द गिर्द पुस्तक समीक्षा: मनोज कुमार की किताब कैसी है?
  • शेयर मार्केट में नुकसान क्यों होता है? 8 बड़ी गलतियां और बचने के तरीके
  • शेयर मार्केट क्या है और इससे पैसे कैसे कमाएं? पूरी जानकारी
  • Probo App क्या है? Probo अभी बंद है या चालू? पूरी जानकारी
  • GyanKamao से पैसे कैसे कमाएं? GyanKamao क्या है और कैसे काम करता है?
  • Freelancing से पैसे कैसे कमाएं? Freelancer बनने की पूरी जानकारी
  • Facebook Ads से पैसे कैसे कमाएं? पूरी जानकारी
  • Bike Se Paise Kaise Kamaye? बाइक से पैसे कमाने के 12 तरीके
Facebook Twitter Instagram Pinterest LinkedIn Reddit RSS
AchhiBaatein.Com
  • Business Ideas
  • Success Stories
  • व्यक्तित्व विकास
  • सफलता के रहस्य
  • Book Summary
  • Health Tips
AchhiBaatein.Com
श्रीमदभागवत गीता अंश 12 Mins Read

श्रीमद्भगवद्गीता का सार: संसार का स्वरूप और जीवन का रहस्य

Mahesh YadavBy Mahesh YadavUpdated:Aug 17, 20262 Comments12 Mins Read
श्रीमद्भगवद्गीता का सार और जीवन का रहस्य
साझा करें
Twitter LinkedIn Pinterest Tumblr Reddit WhatsApp

धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों ने सदियों से मानव जीवन को सही दिशा दिखाने का काम किया है। हम जिस भी परंपरा और विचारधारा से जुड़े होते हैं, उसके आदर्श हमें जीवन को समझने और अपने कर्मों पर विचार करने की प्रेरणा देते हैं।

इस लेख में
  • श्रीमद्भगवद्गीता हमें क्या समझाती है?
  • अध्याय 1 – अर्जुन विषाद योग
  • अध्याय 2 – सांख्य योग
  • अध्याय 3 – कर्म योग
  • अध्याय 4 – ज्ञान और कर्म का विवेक
  • अध्याय 5 – कर्म संन्यास योग
  • अध्याय 6 – ध्यान योग
  • अध्याय 7 – ज्ञान-विज्ञान योग
  • अध्याय 8 – अक्षर ब्रह्म योग
  • अध्याय 9 – राजविद्या राजगुह्य योग
  • अध्याय 10 – विभूति योग
  • अध्याय 11 – विश्वरूप दर्शन योग
  • अध्याय 12 – भक्ति योग
  • अध्याय 13 – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
  • अध्याय 14 – गुणत्रय विभाग योग
  • अध्याय 15 – पुरुषोत्तम योग
  • अध्याय 16 – दैवासुर संपद् विभाग योग
  • अध्याय 17 – श्रद्धात्रय विभाग योग
  • अध्याय 18 – मोक्ष संन्यास योग
    • 1. अपना कर्तव्य समझना जरूरी है
    • 2. कर्म पर ध्यान देना चाहिए
    • 3. मन को नियंत्रित करना आवश्यक है
    • 4. सफलता और असफलता में संतुलन जरूरी है
    • 5. ज्ञान केवल जानकारी नहीं है
    • 6. अहंकार और अत्यधिक आसक्ति से बचना चाहिए
    • 7. जीवन को व्यापक दृष्टि से देखना चाहिए
  • भगवद्गीता में कितने अध्याय हैं?
  • भगवद्गीता का मुख्य संदेश क्या है?
  • क्या भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ है?
  • भगवद्गीता का पहला अध्याय कौन सा है?
  • भगवद्गीता का अंतिम अध्याय कौन सा है?
  • निष्कर्ष

श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दू परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में हुआ संवाद प्रस्तुत किया गया है। गीता में कर्म, ज्ञान, भक्ति, मन, कर्तव्य, आत्मा, प्रकृति और जीवन के उद्देश्य जैसे अनेक विषयों पर विचार मिलता है।

गीता केवल कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखने की बात नहीं करती, बल्कि यह भी समझने का अवसर देती है कि हमारा कर्तव्य क्या है, कर्म करते समय हमारी सोच कैसी होनी चाहिए और जीवन की परिस्थितियों को किस दृष्टि से देखा जा सकता है।

मेरे लिए श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ने और समझने की सबसे बड़ी वजह यही है कि इसके विचार जीवन के अलग-अलग संघर्षों और परिस्थितियों पर सोचने का एक अलग दृष्टिकोण देते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता हमें क्या समझाती है?

यदि गीता के विशाल दर्शन को बहुत सरल शब्दों में समझने की कोशिश करें, तो इसमें हमें कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मसंयम, कर्तव्य और जीवन की वास्तविकता पर विचार करने की प्रेरणा मिलती है।

गीता में कुल 18 अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय को एक अलग योग के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

नीचे मैं प्रत्येक अध्याय में बताए गए विचारों को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

नोट: नीचे दिए गए अध्याय-सार मूल संस्कृत श्लोकों का शब्दशः अनुवाद नहीं हैं। इन्हें सरल भाषा में संक्षिप्त भावार्थ और मूल लेख की प्रस्तुति के आधार पर समझाने का प्रयास किया गया है।

भगवद्गीता के 18 अध्यायों का सार

अध्याय 1 – अर्जुन विषाद योग

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन अपने सामने खड़े कौरव पक्ष के योद्धाओं में अपने गुरु, रिश्तेदार और प्रियजनों को देखते हैं। उन्हें देखकर उनका मन विचलित हो जाता है।

अर्जुन के सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा हो जाता है—क्या अपने ही लोगों से युद्ध करके राज्य और विजय प्राप्त करना उचित है?

वे भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वे युद्ध नहीं करना चाहते। अपने गुरुजनों और संबंधियों को मारकर प्राप्त राज्य का सुख उन्हें स्वीकार नहीं है।

यहीं से अर्जुन का मानसिक संघर्ष शुरू होता है और इसी परिस्थिति में श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, कर्तव्य और जीवन के गहरे सत्य समझाना शुरू करते हैं। अध्याय 1 – अर्जुन विषाद योग पढ़ें


अध्याय 2 – सांख्य योग

अध्याय 2 में श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा, शरीर, कर्म और कर्तव्य के बारे में समझाते हैं।

शरीर परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा को नित्य और अविनाशी बताया गया है। इसी अध्याय में निष्काम कर्म और स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के गुणों पर भी चर्चा होती है।

जीवन में सफलता और असफलता के बीच संतुलित रहने तथा अपने कर्तव्य पर ध्यान देने की सीख इस अध्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अध्याय 2 – सांख्य योग पढ़ें


अध्याय 3 – कर्म योग

कर्म योग में कर्म के महत्व को समझाया गया है।

मनुष्य को अपना कर्तव्य करते हुए कर्म के फल के प्रति अत्यधिक आसक्ति से बचने की प्रेरणा मिलती है।

इसका एक सरल भाव यह है कि हमें केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य और व्यापक हित को ध्यान में रखकर कर्म करना चाहिए।

जो कर्म हम अपने लिए नहीं चाहते, वही दूसरों के प्रति भी नहीं करना चाहिए। अध्याय 3 – कर्म योग पढ़ें


अध्याय 4 – ज्ञान और कर्म का विवेक

इस अध्याय में ज्ञान, कर्म और आध्यात्मिक समझ के संबंध को समझाया गया है।

कर्म करते हुए यदि मनुष्य उसके वास्तविक उद्देश्य और अपने स्वरूप को समझने का प्रयास करता है, तो वही कर्म उसके लिए ज्ञान का माध्यम बन सकता है।

ज्ञान केवल जानकारी प्राप्त करने का नाम नहीं है, बल्कि अपने कर्म और जीवन के वास्तविक अर्थ को समझना भी है। अध्याय 4 – ज्ञान और कर्म का विवेक पढ़ें


अध्याय 5 – कर्म संन्यास योग

कर्म योग और संन्यास के बीच संबंध को समझाने वाला यह अध्याय महत्वपूर्ण है।

कर्म से पूरी तरह भाग जाना ही संन्यास नहीं है। अपने कर्म करते हुए उसके फल के प्रति आसक्ति कम करना भी त्याग की भावना से जुड़ा है।

इस दृष्टि से कर्म करते हुए मन की शुद्धि और आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने का विचार मिलता है। अध्याय 5 – कर्म संन्यास योग पढ़ें


अध्याय 6 – ध्यान योग

मन को नियंत्रित करना आसान नहीं है। यह बात आज के जीवन में भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है।

जिस तरह सूत का छोटा-सा रेशा भी सुई की आंख में प्रवेश करने में बाधा बन सकता है, उसी तरह मन में लगातार बनी रहने वाली इच्छाएं और वासनाएं ध्यान को भटकाती हैं।

इस अध्याय में अभ्यास, आत्मसंयम और ध्यान के माध्यम से मन को स्थिर करने की बात कही गई है। अध्याय 6 – ध्यान योग पढ़ें


अध्याय 7 – ज्ञान-विज्ञान योग

इस अध्याय में ज्ञान और उसके अनुभव की बात आती है।

संसार और उसकी प्रकृति को समझने के साथ-साथ परम सत्य को जानने का प्रयास ही वास्तविक ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ना है।

मनुष्य जब संसार को केवल बाहरी रूप में देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद व्यापक सत्य को समझने का प्रयास करता है, तब उसकी दृष्टि बदलने लगती है। अध्याय 7 – ज्ञान-विज्ञान योग पढ़ें


अध्याय 8 – अक्षर ब्रह्म योग

इस अध्याय में ब्रह्म, आत्मा, कर्म और परमात्मा से जुड़े प्रश्नों पर चर्चा होती है।

मनुष्य का अंतिम समय और उस समय उसके मन की अवस्था भी महत्वपूर्ण मानी गई है।

जीवनभर जिस विचार और चेतना का अभ्यास किया जाता है, उसका प्रभाव मनुष्य के जीवन और आध्यात्मिक यात्रा पर पड़ता है। अध्याय 8 – अक्षर ब्रह्म योग पढ़ें


अध्याय 9 – राजविद्या राजगुह्य योग

अध्याय 9 में ज्ञान और भक्ति के महत्व को विशेष रूप से समझाया गया है।

यह अध्याय परमात्मा, प्रकृति और जीव के संबंध को समझने की दिशा में विचार प्रस्तुत करता है।

भक्ति को केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि मन की गहरी श्रद्धा और समर्पण से जोड़कर देखा गया है। अध्याय 9 – राजविद्या राजगुह्य योग पढ़ें


अध्याय 10 – विभूति योग

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों और उस व्यापक शक्ति के बारे में बताते हैं जिसके माध्यम से संसार में उनकी उपस्थिति को समझा जा सकता है।

प्रकृति और संसार में दिखाई देने वाली श्रेष्ठ और प्रभावशाली चीजों के माध्यम से परम सत्ता को समझने का प्रयास किया गया है।

यह अध्याय व्यक्ति को अपने आसपास की दुनिया को एक व्यापक दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देता है। अध्याय 10 – विभूति योग पढ़ें


अध्याय 11 – विश्वरूप दर्शन योग

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उनके विराट स्वरूप को देखने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और अर्जुन उनके विराट स्वरूप का दर्शन करते हैं।

यह प्रसंग गीता के सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली प्रसंगों में से एक है, जिसमें अर्जुन को संसार और समय की विशालता का एक अद्भुत अनुभव होता है। अध्याय 11 – विश्वरूप दर्शन योग पढ़ें


अध्याय 12 – भक्ति योग

अध्याय 12 में भक्ति योग की चर्चा होती है।

भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण को भक्ति का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।

भारतीय परंपरा में भक्ति के विभिन्न रूप बताए गए हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।

इस अध्याय का मूल संदेश व्यक्ति को प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की भावना से जोड़ता है। अध्याय 12 – भक्ति योग पढ़ें


अध्याय 13 – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

इस अध्याय में शरीर और उसे जानने वाले चेतन तत्व के बीच अंतर को समझाने का प्रयास किया गया है।

इसे समझने के लिए खेत और उसमें बोए गए बीज का उदाहरण लिया जा सकता है।

जिस प्रकार खेत में बोए गए बीज के अनुसार परिणाम मिलता है, उसी तरह मनुष्य के कर्म और उसके जीवन के अनुभवों के बीच संबंध को समझने की कोशिश की गई है। अध्याय 13 – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग पढ़ें


अध्याय 14 – गुणत्रय विभाग योग

प्रकृति के तीन गुण—सत्व, रज और तम—इस अध्याय का प्रमुख विषय हैं।

इन तीन गुणों के माध्यम से मनुष्य के व्यवहार, सोच और कर्मों को समझने का प्रयास किया गया है।

सात्विकता को ज्ञान और संतुलन से, रजोगुण को सक्रियता और इच्छाओं से तथा तमोगुण को अज्ञान और जड़ता से जोड़ा जाता है। अध्याय 14 – गुणत्रय विभाग योग पढ़ें


अध्याय 15 – पुरुषोत्तम योग

इस अध्याय में संसार, जीव और परम पुरुष के संबंध पर विचार किया गया है।

श्रीकृष्ण मनुष्य को निराश न होने की प्रेरणा देते हैं और परम सत्य की ओर बढ़ने का मार्ग बताते हैं।

इस अध्याय में मनुष्य और परमात्मा के संबंध को समझने की आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत की गई है। अध्याय 15 – पुरुषोत्तम योग पढ़ें


अध्याय 16 – दैवासुर संपद् विभाग योग

मनुष्य के अंदर मौजूद दैवी और आसुरी गुणों का वर्णन इस अध्याय का प्रमुख विषय है।

सत्य, आत्मसंयम, करुणा और सदाचार जैसे गुणों को सकारात्मक दिशा से जोड़ा गया है, जबकि अहंकार, क्रोध, लोभ और अत्यधिक आसक्ति जैसे गुणों को मनुष्य के पतन का कारण बताया गया है।

यह अध्याय हमें अपने व्यवहार और व्यक्तित्व पर स्वयं विचार करने का अवसर देता है। अध्याय 16 – दैवासुर संपद् विभाग योग पढ़ें


अध्याय 17 – श्रद्धात्रय विभाग योग

मनुष्य की श्रद्धा और उसके स्वभाव के बीच संबंध को इस अध्याय में समझाया गया है।

मनुष्य जिस प्रकार की श्रद्धा रखता है, उसका प्रभाव उसके व्यवहार, भोजन, तप, दान और जीवनशैली पर भी दिखाई दे सकता है।

इसलिए केवल श्रद्धा होना ही नहीं, बल्कि श्रद्धा की प्रकृति को समझना भी महत्वपूर्ण है। अध्याय 17 – श्रद्धात्रय विभाग योग पढ़ें


अध्याय 18 – मोक्ष संन्यास योग

यह भगवद्गीता का अंतिम अध्याय है और इसमें पहले बताए गए अनेक विषयों का समन्वय दिखाई देता है।

अर्जुन संन्यास और त्याग के बारे में प्रश्न करते हैं। श्रीकृष्ण कर्म, त्याग, ज्ञान, कर्तव्य, स्वभाव और भक्ति सहित अनेक विषयों को समझाते हैं।

अंत में शरणागति और परमात्मा के प्रति समर्पण की भावना को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। अध्याय 18 – मोक्ष संन्यास योग पढ़ें


भगवद्गीता से जीवन के लिए क्या सीख मिलती है?

भगवद्गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में पढ़ने के बजाय उसके विचारों पर जीवन के संदर्भ में भी विचार किया जा सकता है।

1. अपना कर्तव्य समझना जरूरी है

कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना आसान नहीं होता। अर्जुन का संघर्ष हमें बताता है कि निर्णय से पहले अपने कर्तव्य और परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

2. कर्म पर ध्यान देना चाहिए

परिणाम हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन हमारा प्रयास और कर्म काफी हद तक हमारे हाथ में होते हैं।

3. मन को नियंत्रित करना आवश्यक है

मन की चंचलता व्यक्ति को एकाग्र होने से रोक सकती है। अभ्यास और आत्मसंयम के माध्यम से मन को बेहतर दिशा दी जा सकती है।

4. सफलता और असफलता में संतुलन जरूरी है

जीवन में हर समय हमारी इच्छा के अनुसार परिणाम नहीं मिलता। ऐसे समय में मानसिक संतुलन बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है।

5. ज्ञान केवल जानकारी नहीं है

किसी विषय के बारे में पढ़ लेना और उसे जीवन में समझ पाना दो अलग बातें हैं। ज्ञान तब अधिक उपयोगी बनता है जब वह हमारे विचार और व्यवहार में दिखाई देने लगे।

6. अहंकार और अत्यधिक आसक्ति से बचना चाहिए

मनुष्य जब अपनी उपलब्धियों, धन, शक्ति या परिस्थितियों से अत्यधिक जुड़ जाता है, तो उसका मानसिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

7. जीवन को व्यापक दृष्टि से देखना चाहिए

हर परिस्थिति को केवल तत्काल लाभ या नुकसान के नजरिए से देखने के बजाय उसके व्यापक प्रभाव को समझने की कोशिश करनी चाहिए।


श्रीमद्भगवद्गीता से संबंधित अन्य लेख

यदि आप भगवद्गीता और भारतीय दर्शन से जुड़े विषयों को और पढ़ना चाहते हैं, तो AchhiBaatein.com पर ये लेख भी पढ़ सकते हैं:

  • हमें भगवद्गीता क्यों पढ़नी चाहिए?
  • उद्धव गीता – सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है
  • श्रीमद्भगवद्गीता के 16 उपदेश
  • सबसे बड़ा दुश्मन “मन”
  • अष्टावक्र गीता: मोक्ष कैसे संभव है?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता में कितने अध्याय हैं?

श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय को एक अलग योग के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

भगवद्गीता का मुख्य संदेश क्या है?

सरल शब्दों में कहें तो गीता कर्म, कर्तव्य, ज्ञान, भक्ति, आत्मसंयम और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने पर विचार प्रस्तुत करती है।

क्या भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ है?

भगवद्गीता धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रंथ होने के साथ-साथ दर्शन, नैतिकता, कर्म और जीवन के उद्देश्य जैसे विषयों पर भी संवाद प्रस्तुत करती है।

भगवद्गीता का पहला अध्याय कौन सा है?

पहला अध्याय अर्जुन विषाद योग है। इसमें कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले अर्जुन के मानसिक संघर्ष और उनके विषाद का वर्णन है।

भगवद्गीता का अंतिम अध्याय कौन सा है?

18वां अध्याय मोक्ष संन्यास योग है। यह गीता का अंतिम अध्याय है और इसमें संन्यास, त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और शरणागति जैसे विषयों का समन्वय मिलता है।


निष्कर्ष

श्रीमद्भगवद्गीता का संसार बहुत व्यापक है। इसे केवल कुछ पंक्तियों या कुछ उपदेशों में पूरी तरह समझना आसान नहीं है।

फिर भी, यदि हम इसके विचारों को अपने जीवन के संदर्भ में पढ़ें, तो कर्म, कर्तव्य, मन, ज्ञान, भक्ति और आत्मसंयम जैसे विषयों पर बहुत कुछ सोचने को मिलता है।

जीवन में संघर्ष कितना भी हो और मन कितना भी विचलित क्यों न हो, अपने कर्तव्य को समझना, सही दृष्टिकोण रखना और परिस्थितियों से सीखते हुए आगे बढ़ना हमेशा उपयोगी हो सकता है।

यही इस लेख में श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों के सार को सरल रूप में समझाने का मेरा प्रयास है।

यदि इस लेख में किसी धार्मिक विचार या अध्याय के भावार्थ को लेकर आपको कोई त्रुटि दिखाई दे, तो comments के माध्यम से जरूर बताएं।

Previous ArticleBest Inspirational Story मांगों और तुम्हे मिलेगा, खोजो और तुम पा जाओगे
Next Article Manage Criticism Effectively in Hindi (आलोचना प्रबंधन)
Mahesh Yadav
  • Website
  • Facebook
  • Twitter
  • LinkedIn

Mahesh Yadav is a software developer and the founder and author of AchhiBaatein.com , He holds a BE degree and an MBA in Operations Research and has extensive experience in software programming and web development. He writes about motivation, inspirational content, Hindi quotes, career, education and other useful topics for Hindi readers.

यह भी पढ़े

6 Mins Read

दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य

पूरा पढ़े
9 Mins Read

अष्टावक्र गीता : मोक्ष कैसे संभव हैं?

पूरा पढ़े
8 Mins Read

सबसे बड़ा दुश्मन “मन”

पूरा पढ़े

2 Comments

  1. Raju kumar on Oct 20, 2017 3:31 pm

    गीता अध्याय-3 me aapne likha hai ki
    आकाश में विचरण करते वायु को
    कोई मुट्ठी में पकड़ सकता। sayad ye line is prakar hona chahiye tha ki-
    aakash mai vicharan karte wayu ko koi mutthi mai ‘nahi’ pakad sakata.
    Aage aap apna nirnay le ligiye or hamse koi truti hui ho to maf kijiyega…

    Reply
    • Mahesh Yadav on Oct 22, 2017 2:55 pm

      गीता अध्याय-4 में आपके द्वारा चिन्हित की गई त्रुटि सुधार कर ली गई हैं, कृपया त्रुटी के लिए क्षमा करें और सुधार करवाने के लिए आपका कोटि-कोटि धन्यवाद।

      Reply

Leave A Reply Cancel Reply

Popular Posts
16 Mins ReadAug 11, 2026

Financial Planning Tips in Hindi: Business के लिए जरूरी Financial Planning

13 Mins ReadAug 10, 2026

भारत के 28 राज्य और राजधानी, मुख्यमंत्री, भाषा व ISO Code

17 Mins ReadAug 11, 2026

195 देशों की राजधानी और मुद्रा

10 Mins ReadAug 26, 2026

Blog और Blogging क्या हैं? क्या मुझे ब्लॉगिंग करनी चाहिए?

16 Mins ReadAug 20, 2026

Copyright, Patent और Trademark में अंतर क्या है? पूरी जानकारी हिंदी में

Latest Posts
8 Mins ReadAug 8, 2026
तेरे मेरे इर्द गिर्द पुस्तक समीक्षा: मनोज कुमार की किताब कैसी है?
11 Mins ReadAug 8, 2026
शेयर मार्केट में नुकसान क्यों होता है? 8 बड़ी गलतियां और बचने के तरीके
10 Mins ReadAug 8, 2026
शेयर मार्केट क्या है और इससे पैसे कैसे कमाएं? पूरी जानकारी
8 Mins ReadAug 9, 2026
Probo App क्या है? Probo अभी बंद है या चालू? पूरी जानकारी
1 2 3 … 184 Next
Categories
  • Blogging Tips (8)
  • Book Summary (35)
  • Business Ideas & Earn Money (30)
  • General (13)
  • General Knowledge (55)
  • Health Tips (53)
  • Hindi Essay (2)
  • Hindi Quotes (59)
  • Hindi Thoughts (39)
  • Let's Laugh (8)
  • Motivational Hindi Songs (47)
  • Motivational Hindi Stories (25)
  • Personality Development (50)
  • Success Stories (17)
  • अमर कहानियाँ (7)
  • चाणक्य नीति (19)
  • चुटकुले (9)
  • जीवनी (63)
  • धार्मिक परंपरा व आस्था (12)
  • प्रेरक प्रसंग (10)
  • महत्वपूर्ण जानकारियां (9)
  • रोचक घटनाये (3)
  • रोचक तथ्य (8)
  • लोक व्यवहार (33)
  • श्रीमदभागवत गीता अंश (9)
  • सफलता के मंत्र (73)
  • सफलता के रहस्य (54)
  • हिंदी कहानियाँ (93)
  • हिंदी दोहे और उक्तिया (1)
  • हिंदी शेर और शायरी (6)
  • हिन्दी कविताएं (40)
About Us

अच्छी बातें डॉट कॉम

AchhiBaatein is a famous Hindi blog for Famous Quotes and Thoughts, Motivational & Inspirational Hindi Stories and Personality Development Tips

DMCA.com Protection Status

Recent Comment
  • Vijay Pal on आखिर जीवन का लक्ष्य क्या हैं?
  • Mahesh Yadav on Gratitude क्या है और इसके फायदे?
  • kumar on Gratitude क्या है और इसके फायदे?
  • puja on Top 10 successful profitable startups in India
Subscribe to Updates
सभी नए Posts अपने E-Mail पर तुरंत पाने के लिए यहाँ अपनी E-mail ID लिखकर Subscribe करें।

कृपया यहाँ Subscribe करने के बाद अपनी E-mail ID खोलें तथा भेजे गये Verification लिंक पर Click करके Verify करें

Powered by ® Google Feedburner

Copyright © achhibaatein.com 2013 - 2026 . All Rights Reserved
  • About Us
  • Contact Us
  • Advertise
  • Guest Column
  • Privacy Policy
  • Sitemap

Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.