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सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते

इंसान गलती और गुनाह का पुतला है। अपने ज़िन्दगी के हर मोड़ पर वह गलतियां करता है। वास्तव में ईश्वर ने इंसान को गलती की प्रवृत्ति और फितरत पर पैदा किया है।

इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि उसने इंसानों के साथ अन्याय किया है बल्कि ईश्वर के द्वारा इस सृष्टि की रचना का मकसद इन्सानों की आजमाईश कर उनकी परीक्षा लेना था। इसी के साथ उसने इंसान को सही और ग़लत के फर्क को समझने की ज़बरदस्त क्षमता से लैस भी किया है।

दरअसल, ग़लती या गुनाह कोई ऐसी चीज़ नहीं है कि जिसके आधार पर इन्सान दूसरे इंसान को हीन भावना से देखे या फिर उसकी ग़लती पर उसे अपनी नज़रों से ही गिरा दे। बुद्धिजीवियों के अनुसार गलती और गुनाह में थोड़ा सा फर्क होता है।

गुनाह वह होते हैं जो आदमी यह समझते हुए कि यह गलत है, अंजाम देता है। जबकि गलती वह होती है जो ग़लत काम वह सही समझ कर अंजाम देता है। लेकिन अगर इन्सान किसी को उसकी गलती या गुनाह पर माफ करना चाहे तो ये दोनों ही क्षमा(kshama) योग्य हैं।

इसे समझाने के लिए हिंदी में एक लोकोक्ति (मुहावरा) बेहद प्रचलित है जिसमें यह कहा जाता है कि

“सुबह का भूला अगर शाम को वापस घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।”

मतलब ये कि कोई इंसान लम्बे अरसे से किसी गलती या गुनाह के समुद्र में डूबा हो और फिर वह लोगों के समझाने या खुद उसे गलत समझ लेने के बाद त्याग देता हो तो वास्तव में वह गुनाहगार नहीं है। उसे उसकी गलती पर क्षमा (Forgive) कर देना चाहिए।

ये मुहावरा उन लोगों को समझाने के लिए है जो किसी के ग़लत आचरण, व्यवहार और बरताव से तंग आकर उसे हमेशा के लिए मुजरिम समझ बैठते हैं और उसे कभी माफ न करने का खयाल अपने दिलो-दिमाग में बिठा लेते हैं। यह विचारधारा ग़लत है।

हमें लोगों के साथ संयम और नरमी का व्यवहार करना चाहिए क्योंकि हम इंसान हैं, जानवर नहीं। हमारे अंदर मानवीय फितरत है और उसी फितरत के तहत हमें लोगों को उनकी गलतियों पर माफ कर देना चाहिए। जैसे- एक शख्स अगर शराबी है तो पूरा समाज उसे हीन-भावना से देखने लगता है और बहुत से लोग तो उस शराबी व्यक्ति से मिलना जुलना तक छोड़ देते हैं।

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तो अब बात यह है कि अगर समाज का हर व्यक्ति यदि उस शराबी से भेंट करना छोड़ दे तो फिर उसे उसकी गलतियों पर समझाएगा कौन? इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि हमें समाज से बुराइयों को खत्म करना है, बुरे लोगों को नहीं। हमारा काम तो लोगों में सुधार करना होना चाहिए और सुधार तभी संभव हो पाएगा जब हम किसी बुरे व्यक्ति के करीब जाकर उसे अच्छी बातों की नसीहत (उपदेश) करेंगे।

आईए जानते हैं कि किन आदतों के चलते समाज से बुराइयों एवं कुरीतियों का खात्मा संभव है

1. बुरे लोगों के भी जाएं करीब

हमारे समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके ग़लत काम पर हम उन्हें अपनी नज़रों से गिरा देते हैं। फिर वह व्यक्ति शर्मिन्दा होकर हर किसी से मिलना जुलना छोड़ देता है। कभी कभार तो वह कड़ी उलझन का शिकार होकर डिप्रेशन में चला जाता है

उसके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचती है। ऐसी स्थिति में हमें इस व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उसके करीब जाकर उसकी ग़लत आदत या व्यवहार के बारे में उससे बातचीत करना चाहिए। दुनिया में बहुत से कठिन मामले तो ऐसे हैं जो केवल बातचीत से ही हल हो जाते हैं।

यहां तक कि जब बातचीत से युद्ध की स्थिति को काबू में किया जा सकता है, तो फिर एक व्यक्ति के दिमाग और उसकी बुरी आदतों को बदला क्यों नहीं किया जा सकता? बातचीत के माध्यम से ही किसी व्यक्ति को सही और ग़लत के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से समझाया जा सकता है।

उसे उसकी बुराईयों के असर के बारे में बताया जाना चाहिए कि कैसे बुरी आदतें इंसान के जीवन को तबाह कर देती हैं। जैसे- अगर कोई व्यक्ति जुआ खेलता है जिसका शुमार बुरी आदत में ही किया जाता है तो जुआरी व्यक्ति को जुए के नकारात्मक प्रभाव के बारे में बताना जरूरी हो जाता है।

उसे ये बताना चाहिए कि वो अपने ज़िन्दगी की गाढ़ी और खून पसीने की कमाई को बेकार कामों में लगाकर कितना बड़ा रिस्क ले रहा है। रिस्क भी ऐसा जो पलभर में उसके जीवनभर की कमाई को मिट्टी में मिला सकता है।

2. अपनी भूल पर भी रखें नजर

इंसान की फितरत है कि वह अपनी बुराईयों को तो नहीं देखता लेकिन दूसरों की गलतियों पर वह पैनी नजर रखता है। ये आदत भी बुरी आदत में शुमार होती है जिसे यदि समय रहते दूर नहीं किया गया तो व्यक्ति को किसी भी क्षण असम्मान, जिल्लत और आलोचनाओं का सामना करना पड़ सकता है।

मिसाल के तौर पर अगर आपको गुस्सा ज्यादा आता है और आपने उस पर काबू न पाया तो यह गलत आदत आपको कहीं भी शर्मिंदा कर सकती है। गुस्से के आलम में इंसान हमेशा गलत निर्णय लेकर अपने आपको जोखिम में डाल लेता है।

यही नहीं बल्कि गुस्से की हालत में लोग यह तक भूल जाते हैं कि उनके सामने कौन है? क्रोध में आकर हम शब्दों के कुछ ऐसे जहरीले तीर चला देते हैं कि कभी कभार तो आजीवन हमें इसका पछतावा लगा रहता है। गुस्से में आकर हम अपने ऊपर नियंत्रण को बैठते हैं जिसका खामियाजा हमें लंबे समय तक पछतावे के रूप में भुगतना पड़ता है।

क्रोधित होकर कुछ लोग बेकार की बहस भी करने लगते हैं और आपस में उलझ कर अपने संबंध खराब कर लेते हैं। बड़े बड़े पहलवान और बलशाली लोग भी अपने गुस्से को पटखनी नहीं दे पाते लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपनी बुद्धि और विवेक पर काबू होता है।

अगर आपमें यह बुरी आदत पाई जाती है तो आपको अपनी भूल सुधारने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी और अपने व्यक्तित्व में निखार पैदा करना होगा। तब कहीं जाकर आप दूसरों को समझा सकेंगे वरना आपकी नसीहत और उपदेशों का दूसरे लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

क्योंकि किसी को सीधे रास्ते पर डालने के लिए पहले स्वयं आपका सीधे रास्ते पर होना बेहद जरूरी है। इसलिए कहा जाता है कि जिस भूले ने अपनी भूल में सुधार कर लिया, वास्तव में उसने बड़ा कारनामा अंजाम दे दिया क्योंकि गलत रास्ते पर जाने के बाद सही रास्ते पर लौट आना बड़े साहस और दिल गुर्दे की बात होती है।

3. कामुकता भी है बड़ी भूल

हम अपने आसपास के क्षेत्र और सोशल मीडिया पर जब नजर करते हैं तो मालूम होता है कि इस आधुनिक युग में हममें से ज्यादातर लोग कामुकता (Sexuality) के पीछे ही भाग रहे हैं। दरअसल कामुकता यानी अपनी ख्वाहिशों के पीछे चलना एक ऐसी संक्रामक बीमारी है जो लोगों को देखकर अपने पांव पसारती है।

कामुकता से आपके भीतर के गुण, प्रतिभा और अच्छी आदतें बिल्कुल उसी तरह बर्बाद हो जाती हैं जैसे आग लकड़ी को खाकर उसे किसी लायक नहीं छोड़ती। और मजे की बात तो यह है कि कामुकता के पीछे भागने वाले लोग कभी अपने पतन का एहसास भी नहीं कर पाते।

बड़ी मुश्किल से जब उन्हें एहसास होता है कि उन्होंने इस चक्कर में पड़कर कितना समय व्यर्थ किया है और अपने असल टारगेट से कितना दूर निकल आए हैं…तो बहुत देर हो चुकी होती है।

इंसान को हर हाल में अपने जीवन से जुड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक पॉइंट पर ही फोकस करना चाहिए और जब तक वह लक्ष्य प्राप्त न कर ले उसे अपने कदम डगमगाने नहीं देना चाहिए। कोई व्यक्ति अगर कामुकता के जाल में उलझ ही गया है और फिर उसने पुरजोर कोशिश करके अपने आपको उससे बचा लिया और नेकी की राह पर वापस लौट आया तो उसका यही प्रायश्चित लोगों की माफी के लिए काफी होना चाहिए। लोगों को उसे सच्चे मन से माफ कर देना चाहिए।

4. व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर जरूरतमंदों की मदद करें

आजकल अधिकतर लोगों में एक अजीब सी बुरी फितरत ने जड़ पकड़ ली है। अगर वे किसी के साथ भी रहते हैं तो दिल से नहीं रहते बल्कि दिमाग से रहते हैं। जब किसी आदमी से फायदा नजर आता है तो उसका साथ धर लेते हैं और काम निकल जाने के बाद उस व्यक्ति को ऐसे भूल जाते हैं जैसे कभी उनका उससे वास्ता ही ना रहा हो।

ये आचरण और व्यवहार मानवता के बुनियादी सिद्धांतों के बिल्कुल खिलाफ है। एक इंसान को दूसरे इंसान से मानवता के आधार पर लगाव होना चाहिए ना कि लोभ, लालच या व्यक्तिगत स्वार्थ की बिना पर। ऐसे लोग किसी की ज़रूरत पर काम नहीं आते और केवल अपने काम निकाल कर रफूचक्कर हो जाते हैं।

ऐसे लोग अपने स्वार्थ के सामने लोगों की भावनाओं को भी ताखे पर रख देते हैं। लेकिन उनका यह स्वभाव ज़्यादा दिनों  तक उनका साथ नहीं देता। बहुत जल्द लोग स्वार्थी इंसान की पहचान कर उससे दूर हो जाते हैं।

नतीजतन, वो समाज में बदनाम और अकेला रह जाता है। इसके विपरीत, जो लोग दूसरों की ज़रूरत पर काम आते हैं, उन्हें पूरा समाज इज्जत और सम्मान की दृष्टि से देखता है और उसकी जरूरतों पर उसके साथ खड़ा होता है। अगर आपका स्वभाव भी स्वार्थी लोगों जैसा है तो अपने व्यक्तित्व का अविलंब जायज़ा लेकर अपनी भूल में सुधार कर लीजिए। क्योंकि अतीत की गलतियां अक्सर लोग माफ कर दिया करते हैं।

निष्कर्ष
इस लेख का सारांश ये है कि हमें किसी के अतीत की गलतियों को गोद में लेकर नहीं बैठना चाहिए बल्कि नेकी की राह पर वापस होने पर उसका ज़बरदस्त स्वागत करते हुए उसका उत्साह बढ़ाना चाहिए।

यही वजह है कि हम हिंदी की लोकोक्ति में कहते हैं कि सुबह का भूला अगर शाम को वापस आए तो उसे भूला नहीं कहते। अगर आप वाकई सुधर गए हैं तो लोग आपके सकारात्मक स्वभाव परिवर्तन पर आपकी पिछली गलतियों को ज़रूर भुला देंगे।

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