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चाणक्य नीति Chapter 13 In Hindi | Chanakya Niti के महत्वपूर्ण विचार

चाणक्य नीति Chapter 13 In Hindi

चाणक्य नीति Chapter 13 में आचार्य चाणक्य ने वर्तमान में जीने, कर्म, भाग्य, बुद्धि, गुरु, धर्म, इच्छाओं और जीवन के उद्देश्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण विचार बताए हैं। इस अध्याय में व्यक्ति को अपने वर्तमान कर्मों पर ध्यान देने और जीवन की परिस्थितियों को समझदारी से स्वीकार करने की सीख मिलती है।

महान कूटनीतिज्ञ चाणक्य को भारतीय इतिहास के प्रभावशाली व्यक्तित्वों में गिना जाता है। उन्होंने राजनीति, कूटनीति और समाज से जुड़े अनेक विचार दिए। उनकी नीतियों को आज भी अलग-अलग संदर्भों में पढ़ा जाता है।

इससे पहले आप चाणक्य नीति Chapter 12 भी पढ़ सकते हैं। अब आइए जानते हैं चाणक्य नीति त्रयोदश अध्याय के महत्वपूर्ण विचार।

चाणक्य नीति Chapter 13

1. लंबे दुःख से बेहतर है छोटा सुखी जीवन

दुःख के लंबे जीवन की अपेक्षा सुख का अल्प जीवन ही सबको अच्छा लगता है। चाणक्य नीति के इस विचार में जीवन की लंबाई से अधिक उसके सुख और अच्छे कर्मों को महत्व दिया गया है।

A life of one moment, doing good deeds is better than a long life of an age engaged in misdeeds.

सीख: केवल लंबे समय तक जीना ही महत्वपूर्ण नहीं है। जीवन को अच्छे कर्मों और सार्थक कार्यों से उपयोगी बनाना भी जरूरी है।

2. अतीत पर पछताने और भविष्य की चिंता के बजाय वर्तमान पर ध्यान दें

भूत और भविष्य पर विचार करने की अपेक्षा वर्तमान का चिंतन करने में ही बुद्धिमता है, क्योंकि वर्तमान ही अपना है।

Do not repent for the past. Do not worry about the future. Concentrate on making maximum good use of the present.

अतीत की घटनाएं वापस नहीं आतीं और भविष्य पूरी तरह हमारे नियंत्रण में नहीं होता। इसलिए वर्तमान समय का सही उपयोग करना अधिक उपयोगी हो सकता है।

सीख: पिछली गलतियों से सीखें, भविष्य के लिए तैयारी करें और आज के काम पर पूरा ध्यान दें।

3. प्रेम और अच्छे व्यवहार से लोग प्रसन्न होते हैं

देवजन, सज्जन और पिता अपने भक्त, आश्रित और पुत्र पर स्वभाव से ही प्रसन्न रहते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए किसी विशेष प्रयास अथवा आयोजन की आवश्यकता नहीं रहती।

जाति-बन्धु को खिलाने-पिलाने से तथा ब्राह्मण को सम्मानपूर्ण संभाषण से प्रसन्न किया जा सकता है। अर्थात सज्जन व्यक्ति प्रेमपूर्ण व्यवहार से ही प्रसन्न हो जाता है। उसे किसी दिखावटी कार्य की आवश्यकता नहीं होती।

Good nature pleases deity, nobles and father. Good food pleases friends and brother. And a good talk pleases the scholars and the learned ones.

नोट: यह विचार प्राचीन सामाजिक और धार्मिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है। इसका व्यापक संदेश प्रेमपूर्ण व्यवहार, अतिथि-सत्कार और सम्मान से जुड़ा है।

4. धन आने पर भी विनम्र रहना चाहिए

महात्मा लोग बहुत विचित्र होते हैं। वे एक ओर तो लक्ष्मी को तिनके के समान तुच्छ समझते हैं। उन्हें धन की चिंता नहीं होती। दूसरी ओर यदि उनके पास लक्ष्मी आ जाती है, तो वे अत्यधिक नम्र हो जाते हैं।

समृद्धि की चाहत न करना और समृद्धि आने पर उद्दंड न होना महापुरुषों का लक्षण बताया गया है। वे सदा नम्र बने रहते हैं।

The great ones have a strange nature. Money does not make them vain. In fact, the weight of it makes them more gentle and kind.

सीख: धन और सफलता मिलने पर अहंकार के बजाय विनम्रता बनाए रखना व्यक्ति के चरित्र की पहचान है।

5. अत्यधिक मोह दुःख का कारण बन सकता है

मनुष्य को जिस व्यक्ति से स्नेह होता है, वह उसके संबंध में ही चिंता करता है। जिस व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का लगाव नहीं होता, उसके दुखी और सुखी होने से उसे क्या लेना-देना?

अतः दुःख का मूल कारण स्नेह बताया गया है। इसलिए ज्ञानवान व्यक्ति को अधिक लगाव का परित्याग कर देना चाहिए, जिससे वह अपना जीवन सुखपूर्वक बिता सके। यहां स्नेह का अर्थ मोह है और मूल विचार के अनुसार मोह दुःख की जड़ है।

One who is infatuated, he is afraid. Infatuation is the cause of all miseries, the very root cause. Quit getting infatuated and be happy.

सीख: प्रेम और अपनापन जीवन के लिए जरूरी हैं, लेकिन अत्यधिक मोह व्यक्ति को चिंता और तनाव में डाल सकता है। इसलिए भावनाओं में संतुलन रखना उपयोगी है।

6. संकट आने से पहले तैयारी करें

सुख-दुःख और मान-सम्मान जीवन के दो पहलू हैं। जो व्यक्ति इनमें अधिक लिप्त नहीं होता, वह प्रसन्न रहता है।

भाग्य के सहारे न रहकर आने वाले संकट से बचने का पहले से उपाय सोच लेना अच्छा है। मनुष्य को पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए। पुरुषार्थी व्यक्ति संकट को पार कर लेता है। जो यह सोचता है कि “जो कुछ होगा देखा जाएगा”, वह नष्ट हो सकता है।

व्यक्ति को उद्योग और प्रयास करना चाहिए। केवल भाग्य के भरोसे बैठना उचित नहीं है।

One who takes precautions against probable problems without delay is always secure and happy. Those who procrastinate or think “whatever will be, will be, we shall see” perish.

सीख: भविष्य की हर समस्या रोकी नहीं जा सकती, लेकिन तैयारी और समय पर प्रयास से उसका प्रभाव कम किया जा सकता है।

7. नेतृत्व का प्रभाव लोगों पर पड़ता है

राजा धर्मात्मा होता है तो प्रजा भी धार्मिक होती है। राजा के पापी होने पर प्रजा में पापाचार फैल जाता है। इसी प्रकार घर में भी यह नियम लागू होता है। मां-बाप जैसा व्यवहार करते हैं, संतान भी उनसे बहुत कुछ सीखती है।

As the king is, so is the subject. The subjects of a noble king are noble; of a wicked king wicked and subjects of mediocre are mediocre.

सीख: नेतृत्व और परिवार के बड़े सदस्यों का व्यवहार दूसरों पर प्रभाव डाल सकता है। इसलिए उदाहरण बनकर नेतृत्व करना महत्वपूर्ण है।

8. अच्छे आचरण से व्यक्ति की कीर्ति बनी रहती है

आचार्य कहते हैं कि धर्म से विमुख लोगों को मैं मृतवत समझता हूं। धार्मिक व्यक्ति मरने के बाद भी अपनी कीर्ति के कारण जीवित रहता है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।

A non-religious person is living dead. A truly religious person has a long life. No doubt about it.

यह कथन धार्मिक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसका व्यापक भाव यह है कि अच्छे कर्म और अच्छा आचरण व्यक्ति की पहचान को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।

9. चार पुरुषार्थों का महत्व

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों में से दो धर्म और मोक्ष का संबंध परलोक से तथा दो अर्थ और काम का संबंध इस लोक से बताया गया है।

जो जीव मानव शरीर पाकर भी इन चारों में से किसी एक को पाने का प्रयास नहीं करता, उसका जन्म निरर्थक माना गया है। मूल नीति में मनुष्य की सार्थकता चार पुरुषार्थों से जोड़ी गई है।

Religion, riches, love, and nirvana, a person not attaining any one of these four lives is a useless life.

नोट: यह भारतीय दार्शनिक परंपरा के चार पुरुषार्थों पर आधारित विचार है। इन्हें आधुनिक जीवन में धर्म/कर्तव्य, आर्थिक जीवन, इच्छाओं और आध्यात्मिक उद्देश्य जैसे व्यापक विषयों से जोड़ा जा सकता है।

10. ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति दूसरों की निंदा कर सकता है

दुष्ट आदमी दूसरों की कीर्ति को देखकर जलता है। जब स्वयं वह उन्नति नहीं कर पाता, तो वह दूसरों की निंदा करने लगता है।

दुष्टों में प्रबल ईर्ष्या होती है। वे पहले यह दिखाना चाहते हैं कि जिन कर्मों के कारण सज्जनों की प्रशंसा हो रही है, वे सभी कर्म वे भी कर सकते हैं। लेकिन जब अपने प्रयास में सफल नहीं होते, तो उत्कृष्ट कर्मों को ही निकृष्ट बताकर सज्जनों की निंदा करने लगते हैं।

Mean people burn in the fire of jealousy of the fame and fortune of the achievers. They criticize the achievers because they themselves could not achieve it.

सीख: दूसरों की सफलता देखकर ईर्ष्या करने के बजाय उससे प्रेरणा लेना अधिक उपयोगी है।

11. मोह और विषयों से मुक्ति का विचार

मनुष्य का लक्ष्य इस संसार से मुक्ति प्राप्त करना बताया गया है। यदि वह काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विषयों में पड़ जाता है, तो वह आवागमन के बंधनों में फंस जाता है। विषयों में आसक्ति हटाने से मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।

One can attain Moksha only after expelling all worldly desires from heart and mind. The carnal desires weave a web in which one remains trapped.

यह आध्यात्मिक और दार्शनिक विचार है। इसका मुख्य भाव इच्छाओं और आसक्ति पर नियंत्रण से जुड़ा है।

12. आत्मज्ञान और शरीर से अलग आत्मा का विचार

आत्मा और शरीर दो भिन्न चीजें हैं, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है। जब व्यक्ति को यह ज्ञान होता है, तो वह अपने आपको इस संसार से पृथक समझने लगता है।

परम तत्व का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है, अर्थात वह अपने को केवल शरीर न मानकर उससे भिन्न समझने लगता है, तब उसके मन की अवस्था बदल जाती है। मूल विचार के अनुसार, वह जाग्रत अवस्था में भी समाधि जैसी अनुभूति प्राप्त कर सकता है।

The knowledge of the ultimate truth liberates one from the vanity of physical existence.

यह भारतीय आध्यात्मिक दर्शन से जुड़ा विचार है।

13. हर इच्छा पूरी नहीं होती

इस संसार में मनुष्य की सभी इच्छाएं पूरी नहीं होतीं। किसी को भी मनचाहा सुख नहीं मिलता। वस्तुतः सुख-दुःख की प्राप्ति मनुष्य के अपने हाथ में न होकर ईश्वर के अधीन बताई गई है।

इसलिए मनुष्य को जितना भी मिलता है, उतने से ही संतोष करना चाहिए।

Who gets fulfillment of all desires? Only God can, who is all-powerful. So, be content with what you have.

सीख: मेहनत करते हुए उपलब्ध परिस्थितियों और परिणामों को स्वीकार करना मानसिक शांति में मदद कर सकता है।

14. कर्म और उसके फल का संबंध

मनुष्य को कर्मों के अनुरूप ही फल मिलता है। कर्म और फल का अटूट संबंध बताया गया है। जिस प्रकार बछड़ा हजारों गायों के बीच खड़ी अपनी माता को ढूंढ लेता है, उसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी फल के लिए कर्ता को ढूंढ लेता है।

In herds of thousands of cows, a calf seeks out its mother. Similarly, deeds seek out the doer.

सीख: व्यक्ति को अपने कर्मों और उनके संभावित परिणामों की जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

15. जीवन में अपना उद्देश्य निश्चित होना चाहिए

मनुष्य का ध्येय निश्चित होना चाहिए। कर्तव्य-पथ का निश्चय न कर सकने वाले व्यक्ति को न घर में सुख मिलता है और न ही वन में सुख मिलता है।

घर उसे आसक्ति, परिवार के सदस्यों तथा धन-संपत्ति में मोह के कारण काटता है। वन अपने परिवार को छोड़ने के दुःख और अकेलेपन की पीड़ा से व्यथित करता है।

A disorganized person is happy neither in society nor in wild. In society, he is ridiculed by others and in the wild he is alone.

सीख: लक्ष्य और दिशा स्पष्ट न होने पर व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में संतुष्ट महसूस नहीं कर सकता। इसलिए अपने जीवन के उद्देश्य को समझना जरूरी है।

16. गुरु की सेवा से ज्ञान प्राप्त होता है

जिस प्रकार फावड़े से खुदाई करने वाला पृथ्वी के नीचे के जल को निकाल लेता है, उसी प्रकार गुरु की सेवा करने वाला भी गुरु के हृदय में स्थित विद्या को प्राप्त कर लेता है।

It requires digging to get water out of the ground. Similarly, service to guru gets disciple knowledge out of him.

सीख: अच्छे शिक्षक से सीखने के लिए सम्मान, अनुशासन और सीखने की इच्छा जरूरी है।

विद्या और शिक्षा के महत्व पर आप भारत के सबसे बुद्धिमान और पढ़े-लिखे व्यक्ति Shrikant Jichkar के बारे में भी पढ़ सकते हैं।

17. कर्म बुद्धि और भावनाओं को भी प्रभावित करते हैं

मनुष्य जैसे कार्य करता है, उसके विचार, उसकी बुद्धि और उसकी भावनाएं भी वैसी ही बन जाती हैं। यह निश्चित है कि मनुष्यों को उसके पूर्वजन्मों के अच्छे-बुरे कर्मों के अनुरूप सुख-दुःख मिलता है, ऐसा इस नीति में कहा गया है।

इसी प्रकार फल-प्राप्ति कर्मों के अधीन है और जैसे कर्म होते हैं, वैसा ही फल मिलता है। उस समय बुद्धि भी उसी के अनुसार बन जाती है। तथापि बुद्धिमान पुरुष अपनी ओर से सोच-विचार करके काम करता है।

Deeds determine the outcome. Knowledge is shaped by deeds. Still the wise and prudent ones give due thought before executing it.

नोट: पूर्वजन्म और कर्मफल वाला हिस्सा धार्मिक-दार्शनिक विश्वास पर आधारित है। वहीं अपने निर्णय से पहले सोच-विचार करने की सीख व्यवहारिक रूप से समझी जा सकती है।

18. गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान का सम्मान करें

“ॐ इति एकाक्षर ब्रह्म” अर्थात ब्रह्म का नाम ॐ है अथवा “तत्त्वमसि” अर्थात तू ही ब्रह्म है। इस प्रकार एक मंत्र के रूप में सच्चे तत्वज्ञान का उपदेश देने वाले गुरु की जो व्यक्ति वंदना नहीं करता, उसके बारे में मूल नीति में बहुत कठोर धार्मिक परिणाम बताए गए हैं।

A teacher who has imparted knowledge, be it ever a single word, he should be duly respected and paid obeisance to by the disciple.

इस नीति का मुख्य संदेश यह है कि गुरु या शिक्षक द्वारा दिए गए ज्ञान के प्रति सम्मान रखना चाहिए।

19. सज्जन व्यक्ति अपने संकल्प से नहीं डिगते

युग के अंत में सुमेरु पर्वत का चलायमान होना संभव बताया गया है। कल्प के अंत में सातों समुद्रों द्वारा अपनी मर्यादा का त्याग भी संभव माना गया है। परन्तु सज्जन महात्मा युग-युगांतर में भी अपने संकल्प और प्रतिज्ञा से कभी विचलित नहीं होते।

वे अपने निश्चय पर सदैव अडिग रहते हैं। अतः उनका कथन सदैव विश्वसनीय माना जाता है।

At the end of age, the great mount Sumeru moves, at the end of an eon seven seas move, but noble souls do not move away from their target.

सीख: मजबूत संकल्प और अपने उद्देश्य पर टिके रहना व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने में मदद कर सकता है।

चाणक्य नीति Chapter 13 की प्रमुख सीख

चाणक्य नीति Chapter 13 में जीवन को समझने के लिए कई दार्शनिक और व्यवहारिक विचार दिए गए हैं। इनमें से कुछ बातें सीधे आज के जीवन से जुड़ती हैं, जबकि कुछ प्राचीन धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।

चाणक्य नीति Chapter 13 से आज क्या सीखें?

इस अध्याय की सबसे व्यवहारिक सीख वर्तमान समय पर ध्यान देना है। अतीत को बदला नहीं जा सकता और भविष्य की हर घटना हमारे नियंत्रण में नहीं होती। इसलिए आज किए जाने वाले कामों पर ध्यान देना अधिक उपयोगी है।

इसके अलावा, संकट आने से पहले तैयारी करने, अपनी आय और परिस्थितियों को समझने तथा अनावश्यक मोह और ईर्ष्या से बचने की सीख भी महत्वपूर्ण है।

गुरु, ज्ञान और अच्छे कर्मों के महत्व पर दिए गए विचार व्यक्ति को लगातार सीखते रहने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। वहीं पूर्वजन्म, मोक्ष और कर्मफल से जुड़े विचारों को धार्मिक और दार्शनिक संदर्भ में समझना उचित है।

आत्मनिरीक्षण और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी से जुड़ी सीख के लिए आप आत्मनिरीक्षण करो, अन्य को दोष मत दो भी पढ़ सकते हैं।

चाणक्य नीति के अन्य अध्याय पढ़ें

अगर आपको चाणक्य नीति Chapter 13 के ये विचार पसंद आए हैं, तो आप इसके दूसरे अध्याय भी पढ़ सकते हैं:

आप सम्पूर्ण चाणक्य नीति हिंदी में भी पढ़ सकते हैं।

निष्कर्ष

चाणक्य नीति Chapter 13 में वर्तमान में जीने, कर्म करने, बुद्धि का उपयोग करने, गुरु का सम्मान करने और जीवन में स्पष्ट उद्देश्य रखने से जुड़े कई विचार दिए गए हैं।

इस अध्याय की सबसे उपयोगी सीख यह है कि व्यक्ति को केवल भाग्य पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे अपने वर्तमान कर्मों, प्रयासों और निर्णयों पर भी ध्यान देना चाहिए।

इसी तरह सफलता मिलने पर विनम्र रहना, दूसरों की सफलता से ईर्ष्या न करना और कठिन परिस्थितियों के लिए पहले से तैयारी करना जीवन को बेहतर तरीके से संभालने में मदद कर सकता है।

साथ ही, मोक्ष, पूर्वजन्म, कर्मफल और धार्मिक आचरण से जुड़े विचारों को उनके आध्यात्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए। प्राचीन ज्ञान का सबसे अच्छा उपयोग यही है कि उसकी उपयोगी सीख को वर्तमान जीवन की परिस्थितियों में विवेकपूर्वक अपनाया जाए।

Note: सावधानी बरतने के बावजूद यदि ऊपर दिए गए किसी भी Quote (Hindi or English) में आपको कोई त्रुटि मिले तो कृपया comments के माध्यम से अवगत कराएं।

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