क्या आपको लगता है कि दुनिया पहले से ज्यादा खराब होती जा रही है?
क्या गरीबी, बीमारी, हिंसा और दूसरी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं?
अगर आप इन सवालों का जवाब केवल खबरों, सोशल मीडिया और आसपास की घटनाओं को देखकर देंगे, तो आपका जवाब वास्तविक आंकड़ों से अलग हो सकता है।
यही बात Hans Rosling की किताब Factfulness समझाने की कोशिश करती है।
Factfulness हमें बताती है कि हम दुनिया के बारे में कई बार सही जानकारी होने के बावजूद गलत निष्कर्ष क्यों निकाल लेते हैं।
हमारा दिमाग dramatic और negative information को जल्दी notice करता है। इसलिए हमें दुनिया कई बार वास्तविकता से ज्यादा खराब दिखाई देती है।
Hans Rosling के अनुसार दुनिया में अभी भी बहुत बड़ी समस्याएं हैं। लेकिन साथ ही कई क्षेत्रों में लंबे समय में सुधार भी हुआ है।
इसलिए दुनिया को समझने के लिए केवल डर, headlines या isolated घटनाओं पर निर्भर रहने के बजाय facts, data और context को देखना जरूरी है।
इस Factfulness Book Summary in Hindi में हम किताब के 10 Dramatic Instincts को आसान भाषा में समझेंगे। साथ ही यह भी जानेंगे कि ये instincts हमारी सोच और decision making को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
Factfulness क्या है?
Factfulness का सरल अर्थ है:
दुनिया को facts और वास्तविक आंकड़ों के आधार पर समझने की आदत।
Factfulness की किताब Hans Rosling ने Anna Rosling Rönnlund और Ola Rosling के साथ लिखी है। किताब का मुख्य विचार यह है कि हम global trends से जुड़े कई आसान सवालों के जवाब भी अक्सर गलत देते हैं।
इसका कारण केवल जानकारी की कमी नहीं है। हमारे दिमाग में कुछ natural instincts होते हैं जो दुनिया को ज्यादा dramatic तरीके से देखने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
यानी समस्या केवल यह नहीं है कि हमें facts नहीं पता।
कई बार समस्या यह भी है कि हम facts को सही context में नहीं देखते।
उदाहरण के लिए किसी एक जगह गरीबी बढ़ रही हो, तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरी दुनिया में गरीबी उसी गति से बढ़ रही है।
किसी देश में crime की कोई घटना हुई हो, तो इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरी दुनिया पहले से ज्यादा unsafe हो गई है।
इसलिए Factfulness हमें एक अलग तरह की सोच अपनाने के लिए कहती है।
दुनिया हमें वास्तविकता से ज्यादा खराब क्यों दिखाई देती है?
हमारे आसपास negative news की कमी नहीं है।
टीवी पर crime।
Internet पर disasters।
Social media पर arguments।
News websites पर war और political conflict।
इन घटनाओं को देखकर हमारे दिमाग में यह impression बन सकता है कि दुनिया लगातार खराब होती जा रही है।
लेकिन समस्या यह है कि अच्छी progress अक्सर dramatic news नहीं बनती।
अगर किसी देश में लाखों बच्चों की health बेहतर होती है, तो यह हर दिन headline नहीं बनता।
लेकिन अगर किसी जगह एक बड़ी disaster होती है, तो वह तुरंत news बन सकती है।
इसलिए हमारा information environment भी हमारी perception को प्रभावित करता है।
Factfulness का उद्देश्य problems को नकारना नहीं है।
बल्कि यह समझना है कि:
“क्या जो मैं देख रहा हूं, वही पूरी दुनिया की वास्तविक तस्वीर है?”
यही सवाल हमारी thinking को ज्यादा balanced बना सकता है।
Chapter 1: The Gap Instinct
Gap Instinct का मतलब है कि हम चीजों को दो अलग-अलग groups में बांटकर उनके बीच एक बड़ा gap मान लेते हैं।
जैसे:
- अमीर और गरीब
- विकसित और विकासशील
- हम और वे
- सफल और असफल
- आधुनिक और पिछड़े
जब हम दुनिया को केवल दो extreme groups में देखते हैं, तो reality कई बार oversimplified हो जाती है।
असल दुनिया अक्सर इतनी simple नहीं होती।
दो extremes के बीच बहुत सारे लोग और परिस्थितियां मौजूद होती हैं।
दुनिया को दो हिस्सों में देखना
मान लीजिए कोई कहता है:
“कुछ देश बहुत अमीर हैं और बाकी सभी देश गरीब हैं।”
यह दुनिया की वास्तविक आर्थिक स्थिति को पूरी तरह explain नहीं करता।
Factfulness में income और living conditions को ज्यादा detailed तरीके से देखने की बात की गई है।
इसलिए जब भी आपको दो groups के बीच बहुत बड़ा gap दिखाई दे, तो खुद से पूछिए:
“क्या वास्तव में इतना बड़ा gap है?”
Gap Instinct से कैसे बचें?
किसी भी situation को दो हिस्सों में बांटने से पहले बीच की पूरी picture देखने की कोशिश करें।
देखिए:
- majority कहां है?
- middle group कितना बड़ा है?
- क्या दोनों extremes के बीच कई levels मौजूद हैं?
- क्या average पूरी reality बता रहा है?
Rule:
Gap दिखाई दे तो majority को खोजिए।
Chapter 2: The Negativity Instinct
हमारे दिमाग में negative information को ज्यादा importance देने की tendency होती है।
अगर किसी शहर में हजारों लोग रोज सामान्य जीवन जी रहे हैं, तो वह शायद news नहीं बनेगा।
लेकिन उसी शहर में कोई बड़ी घटना हो जाए, तो वह तुरंत headline बन सकती है।
इससे हमें लग सकता है कि negative घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
Bad News ज्यादा याद क्यों रहती है?
मान लीजिए एक दिन आपको दस अच्छी खबरें और दो बुरी खबरें मिलती हैं।
संभव है कि रात तक आपको वही दो बुरी खबरें ज्यादा याद रहें।
क्योंकि negative information हमारे attention को ज्यादा strongly पकड़ सकती है।
Factfulness हमें यह समझने के लिए कहती है कि bad news और worsening situation हमेशा एक ही चीज नहीं हैं।
किसी समस्या की खबर आना यह साबित नहीं करता कि वह समस्या पहले से ज्यादा बड़ी हो गई है।
Progress हमेशा दिखाई क्यों नहीं देती?
मान लीजिए किसी देश में कई वर्षों में education, healthcare या living conditions में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।
यह progress अक्सर एक dramatic event नहीं होती।
इसलिए इसकी चर्चा कम हो सकती है।
दूसरी ओर कोई disaster कुछ घंटों में दुनिया भर में फैल सकती है।
इसलिए information की visibility और वास्तविक trend को अलग-अलग देखना जरूरी है।
Negativity Instinct से कैसे बचें?
जब आपको लगे:
“सब कुछ खराब होता जा रहा है।”
तो रुककर पूछिए:
“क्या वास्तव में ऐसा है?”
और फिर data या long-term trend देखिए।
इसका मतलब यह नहीं कि negative news को ignore कर दें।
बल्कि उसका context समझें।
Rule:
Bad news की अपेक्षा रखें, लेकिन trend को facts से जांचें।
Chapter 3: The Straight Line Instinct
Straight Line Instinct में हम मान लेते हैं कि अगर कोई trend अभी बढ़ रहा है, तो वह इसी गति से आगे भी बढ़ता रहेगा।
लेकिन वास्तविक दुनिया में trends हमेशा straight line में नहीं चलते।
कई trends:
- धीरे बढ़ते हैं
- तेज होते हैं
- फिर slow हो जाते हैं
- कभी-कभी reverse भी हो जाते हैं
इसलिए वर्तमान trend देखकर भविष्य के बारे में सीधा अनुमान लगाना risky हो सकता है।
Population का Example
अगर population कुछ समय तक बढ़ रही है, तो हमारा दिमाग automatically सोच सकता है:
“यह इसी तरह लगातार बढ़ती रहेगी।”
लेकिन population growth fertility rates, mortality, education, income और कई अन्य factors से प्रभावित होती है।
इसलिए किसी trend को समझते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि line ऊपर जा रही है।
यह भी पूछना चाहिए:
“यह line आगे जाकर क्यों नहीं बदल सकती?”
Straight Line Instinct से कैसे बचें?
जब भी कोई graph या trend लगातार ऊपर जाता दिखाई दे, तो तुरंत भविष्य की prediction न करें।
पूछें:
- क्या growth की speed बदल सकती है?
- क्या कोई दूसरा factor इसे प्रभावित करेगा?
- क्या trend पहले भी बदला है?
- क्या यह वास्तव में linear है?
Rule:
हर बढ़ती line को हमेशा सीधी मत मानिए।
Chapter 4: The Fear Instinct
हमें डराने वाली चीजें हमारे attention को बहुत जल्दी पकड़ लेती हैं।
जैसे:
- प्राकृतिक आपदा
- आतंकवाद
- विमान दुर्घटना
- बीमारी
- युद्ध
- हिंसा
इन घटनाओं का डर स्वाभाविक है।
लेकिन समस्या तब होती है जब हमारा डर वास्तविक risk से बहुत ज्यादा बड़ा हो जाता है।
डर और वास्तविक खतरा अलग हो सकते हैं
किसी घटना की dramatic presentation हमें यह महसूस करा सकती है कि वह घटना बहुत common है।
लेकिन किसी risk को समझने के लिए उसकी probability और context देखना जरूरी है।
उदाहरण के लिए किसी unusual accident की खबर बहुत dramatic हो सकती है।
लेकिन केवल उस खबर को देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि वह risk सबसे बड़ा है।
इसलिए:
डर को महसूस कीजिए, लेकिन decision facts देखकर लीजिए।
Fear Instinct से कैसे बचें?
जब कोई खबर आपको बहुत डराए, तो खुद से पूछिए:
“क्या यह वास्तव में उतना dangerous है जितना मुझे अभी लग रहा है?”
इसके बाद probability और reliable data देखें।
Rule:
डर लगे तो risk calculate कीजिए।
Chapter 5: The Size Instinct
किसी एक बड़े number को देखकर हम कई बार उसकी actual importance को बढ़ा-चढ़ाकर समझ लेते हैं।
यही Size Instinct है।
उदाहरण के लिए अगर कोई headline कहती है:
“10 लाख लोग इस समस्या से प्रभावित हुए।”
तो number बहुत बड़ा लग सकता है।
लेकिन जब तक हमें total population और comparison का पता नहीं है, तब तक इस number का सही meaning समझना मुश्किल है।
Context क्यों जरूरी है?
एक number अकेले बहुत कुछ नहीं बताता।
मान लीजिए:
10,000
यह number छोटा भी हो सकता है और बहुत बड़ा भी।
अगर किसी छोटे शहर की population 20,000 है, तो 10,000 बहुत बड़ी संख्या है।
लेकिन अगर population 10 करोड़ है, तो वही number अलग meaning रखता है।
इसलिए numbers को हमेशा context के साथ देखिए।
Size Instinct से कैसे बचें?
जब भी कोई बड़ा number सुनें, पूछें:
- Total कितना है?
- Percentage कितना है?
- पिछले साल कितना था?
- दूसरे देशों या क्षेत्रों से तुलना कैसी है?
- Per person आंकड़ा क्या है?
Rule:
Number देखकर प्रभावित होने से पहले उसका proportion देखिए।
Chapter 6: The Generalization Instinct
हमारा दिमाग चीजों को categories में बांटना पसंद करता है।
यह practical है।
लेकिन समस्या तब होती है जब हम पूरी category के सभी लोगों को एक जैसा मान लेते हैं।
जैसे:
“सभी अमीर लोग ऐसे होते हैं।”
“सभी गरीब लोग ऐसे होते हैं।”
“इस देश के लोग ऐसे ही होते हैं।”
“सभी young लोग ऐसा करते हैं।”
ऐसी generalizations reality को बहुत सरल बना देती हैं।
एक Category के अंदर भी बहुत Diversity होती है
किसी भी group में differences हो सकते हैं।
एक ही देश के लोगों की:
- income अलग हो सकती है
- education अलग हो सकती है
- lifestyle अलग हो सकता है
- beliefs अलग हो सकते हैं
- opportunities अलग हो सकती हैं
इसलिए किसी category की एक characteristic देखकर पूरी category के बारे में conclusion निकालना सही नहीं है।
Generalization Instinct से कैसे बचें?
जब आप किसी group के बारे में कोई statement सुनें, तो पूछिए:
“क्या सभी लोग वास्तव में ऐसे हैं?”
और फिर exceptions और differences खोजिए।
Rule:
Category को देखकर सबको एक जैसा मत मानिए।
Chapter 7: The Destiny Instinct
Destiny Instinct हमें यह मानने के लिए प्रेरित करता है कि कुछ चीजों की destiny पहले से तय है और वे ज्यादा बदल नहीं सकतीं।
उदाहरण:
“यह देश हमेशा गरीब रहेगा।”
“यह culture कभी नहीं बदलेगा।”
“इस परिवार के लोग business नहीं कर सकते।”
“यह व्यक्ति ऐसा ही रहेगा।”
लेकिन समाज, technology, education, economy और culture समय के साथ बदलते रहते हैं।
Change हमेशा तेज नहीं होता
कई बार बदलाव इतना slow होता है कि हमें दिखाई नहीं देता।
लेकिन slow change का मतलब यह नहीं है कि change हो ही नहीं रहा।
किसी देश की education system बदलने में कई साल लग सकते हैं।
Technology के adoption में भी समय लग सकता है।
Culture भी धीरे-धीरे बदलता है।
इसलिए किसी चीज को देखकर यह कहना कि:
“यह हमेशा ऐसा ही रहेगा।”
बहुत strong conclusion हो सकता है।
Destiny Instinct से कैसे बचें?
पूछिए:
“क्या यह वास्तव में हमेशा से ऐसा है?”
और:
“पिछले 20 या 30 वर्षों में इसमें क्या बदलाव आया?”
Long-term history कई बार हमें दिखाती है कि चीजें धीरे-धीरे बदल रही होती हैं।
Rule:
Slow change को भी change मानिए।
Chapter 8: The Single Perspective Instinct
हम complex problems के लिए simple explanation पसंद करते हैं।
क्योंकि simple answer समझना आसान होता है।
लेकिन real-world problems कई कारणों से मिलकर बनती हैं।
उदाहरण के लिए poverty के पीछे केवल एक कारण नहीं हो सकता।
इसके पीछे:
- education
- healthcare
- employment
- infrastructure
- government policies
- geography
- technology
- history
जैसे कई factors हो सकते हैं।
इसलिए किसी complex problem के लिए एक ही कारण या एक ही solution को पूरी तरह responsible मानना सही नहीं है।
एक Tool हर समस्या के लिए काम नहीं करता
अगर आपके पास केवल एक ही perspective है, तो आप हर problem को उसी नजरिए से देखेंगे।
इसलिए अलग-अलग sources, data और perspectives देखना useful हो सकता है।
Single Perspective Instinct से कैसे बचें?
जब आपको लगे:
“इस समस्या का solution यही है।”
तो खुद से पूछिए:
“क्या कोई दूसरा solution भी हो सकता है?”
और:
“क्या मैं इस समस्या को किसी दूसरे perspective से देख सकता हूं?”
Rule:
एक ही solution पर निर्भर मत रहिए।
Chapter 9: The Blame Instinct
जब कुछ गलत होता है, तो हमारा दिमाग किसी व्यक्ति या group को blame करना चाहता है।
यह natural reaction है।
किसी problem के लिए responsible व्यक्ति ढूंढ लेने से हमें लगता है कि हमने problem समझ ली।
लेकिन कई बार वास्तविक कारण इससे कहीं ज्यादा complex होता है।
किसी एक व्यक्ति को दोष देना आसान है
मान लीजिए किसी organization में कोई problem हो गई।
हम तुरंत CEO या manager को blame कर सकते हैं।
लेकिन हो सकता है कि इसके पीछे:
- system
- policies
- incentives
- communication
- resources
- process
जैसे कई factors हों।
इसलिए blame करने से पहले system को समझना जरूरी है।
Blame Instinct से कैसे बचें?
जब कोई problem हो, तो केवल यह मत पूछिए:
“किसकी गलती है?”
इसके साथ पूछिए:
“यह situation पैदा कैसे हुई?”
और:
“कौन-सा system इसे possible बना रहा था?”
इससे हमारा ध्यान केवल व्यक्ति से हटकर पूरी process पर जाता है।
Rule:
Blame करने से पहले system को समझिए।
Chapter 10: The Urgency Instinct
जब हमें लगता है कि कोई problem बहुत urgent है, तो हम जल्दी decision लेने लगते हैं।
कभी-कभी urgency जरूरी होती है।
लेकिन हर situation emergency नहीं होती।
जल्दी Decision लेने की समस्या
अगर कोई कहता है:
“अभी नहीं किया तो कभी मौका नहीं मिलेगा।”
तो हमारा डर बढ़ सकता है।
फिर हम बिना पूरी जानकारी के decision ले सकते हैं।
ऐसा decision बाद में गलत भी साबित हो सकता है।
इसलिए जब कोई situation बहुत urgent दिखाई दे, तो पहले यह समझना जरूरी है कि urgency वास्तविक है या केवल perception है।
Urgency Instinct से कैसे बचें?
अगर possible हो तो:
- facts verify करें
- alternative देखें
- consequences सोचें
- छोटे steps लें
- decision को update करने की गुंजाइश रखें
हर decision को तुरंत final करने की जरूरत नहीं होती।
Rule:
घबराकर बड़ा decision लेने के बजाय छोटे कदम उठाइए।
Factfulness के 10 Instinct एक नजर में
| Instinct | हमारी सोच की tendency | क्या करें? |
|---|---|---|
| Gap Instinct | चीजों को दो groups में बांटना | Majority खोजें |
| Negativity Instinct | Bad news को ज्यादा notice करना | Long-term trend देखें |
| Straight Line Instinct | Trend को हमेशा सीधा मानना | Trend क्यों बदल सकता है, सोचें |
| Fear Instinct | डर को risk से बड़ा समझना | Risk calculate करें |
| Size Instinct | Numbers को context के बिना देखना | Proportion देखें |
| Generalization Instinct | सभी को एक जैसा मानना | Categories के differences देखें |
| Destiny Instinct | चीजों को हमेशा fixed मानना | Slow changes देखें |
| Single Perspective | एक solution पर निर्भर रहना | Multiple perspectives देखें |
| Blame Instinct | किसी व्यक्ति को तुरंत blame करना | System देखें |
| Urgency Instinct | तुरंत action लेने की जरूरत महसूस करना | Facts check करके छोटे कदम लें |
Factfulness हमें क्या सिखाती है?
Factfulness की सबसे महत्वपूर्ण learning यह है कि दुनिया को समझने के लिए केवल अपनी feelings और impressions पर depend नहीं करना चाहिए।
हमें facts को देखना चाहिए।
लेकिन केवल data देखना भी पर्याप्त नहीं है।
Data को context में समझना भी जरूरी है।
किसी single number से पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती।
किसी एक घटना से पूरा trend नहीं समझा जा सकता।
किसी एक व्यक्ति से पूरी category को define नहीं किया जा सकता।
और किसी एक problem का एक ही कारण होना जरूरी नहीं है।
इसलिए fact-based thinking हमें ज्यादा balanced decisions लेने में मदद कर सकती है।
Factfulness को अपनी जिंदगी में कैसे लागू करें?
इस किताब की learning केवल global issues समझने के लिए नहीं है।
आप इसे अपनी daily life में भी apply कर सकते हैं।
1. कोई बड़ी बात सुनें तो source देखें
Social media पर कोई claim देखकर तुरंत believe न करें।
पहले देखें कि information कहां से आई है।
2. एक number देखकर conclusion न निकालें
Number का context समझें।
Percentage और comparison देखें।
3. Bad news देखकर पूरी दुनिया को खराब न मानें
एक घटना पूरी दुनिया का representation नहीं होती।
4. किसी group के बारे में generalization से बचें
हर category के अंदर differences होते हैं।
5. Past को देखकर future fixed न मानें
कई चीजें धीरे-धीरे बदलती हैं।
6. किसी व्यक्ति को तुरंत blame न करें
पहले पूरी situation और system समझें।
7. Urgency में भी सोचने की जगह रखें
हर urgent-looking decision को तुरंत लेने की जरूरत नहीं होती।
Factfulness और सही Decision Making
हमारे decisions हमारी perception पर depend करते हैं।
अगर हमारी perception गलत है, तो decision भी गलत हो सकता है।
उदाहरण के लिए अगर आपको लगता है कि कोई risk बहुत बड़ा है, तो आप unnecessary डर के कारण decision ले सकते हैं।
अगर आपको लगता है कि कोई opportunity हमेशा available रहेगी, तो आप उसे ignore कर सकते हैं।
अगर आपको लगता है कि कोई व्यक्ति या group हमेशा एक जैसा है, तो आप unfair conclusion निकाल सकते हैं।
इसलिए Factfulness हमें एक simple habit सिखाती है:
पहले reality समझिए, फिर conclusion निकालिए।
यह habit personal life, career, business और financial decisions में भी useful हो सकती है।
Factfulness Book से मिलने वाली मुख्य सीख
पूरी किताब को आसान भाषा में समझें तो इसकी मुख्य सीखें इस तरह हैं:
- दुनिया को केवल negative news देखकर judge नहीं करना चाहिए।
- Facts और perception हमेशा एक जैसे नहीं होते।
- दो extremes के बीच बड़ी majority हो सकती है।
- Bad news ज्यादा visible हो सकती है।
- Trends हमेशा straight line में नहीं चलते।
- Fear हमारी risk perception को प्रभावित कर सकता है।
- Numbers को context के साथ देखना चाहिए।
- किसी category के सभी लोग एक जैसे नहीं होते।
- Slow change को ignore नहीं करना चाहिए।
- Complex problems के कई कारण हो सकते हैं।
- किसी एक व्यक्ति को blame करने से पूरी समस्या समझ में नहीं आती।
- Urgency में भी facts check करना जरूरी है।
- Data को समझने के लिए comparison जरूरी है।
- Headlines पूरी reality नहीं बतातीं।
- अपनी assumptions को समय-समय पर challenge करना चाहिए।
- किसी भी claim को blindly accept करने के बजाय evidence देखना चाहिए।
- दुनिया में problems हैं, लेकिन progress को भी देखना जरूरी है।
- Fact-based thinking हमें ज्यादा balanced perspective दे सकती है।
- बेहतर information से बेहतर decisions लेने में मदद मिल सकती है।
- दुनिया को समझने के लिए curiosity और humility दोनों जरूरी हैं।
निष्कर्ष
Factfulness हमें दुनिया को ज्यादा realistic और balanced नजरिए से देखने की कोशिश करना सिखाती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया में कोई problem नहीं है।
गरीबी, युद्ध, बीमारी, inequality और दूसरी बड़ी समस्याएं आज भी मौजूद हैं।
लेकिन केवल problems को देखकर यह मान लेना कि दुनिया हर मामले में लगातार खराब होती जा रही है, भी सही approach नहीं है।
हमें यह समझना चाहिए कि हमारी perception कई natural instincts से प्रभावित हो सकती है।
Gap Instinct हमें दुनिया को दो हिस्सों में दिखा सकता है।
Negativity Instinct हमें bad news ज्यादा दिखा सकता है।
Fear Instinct risk को बड़ा महसूस करा सकता है।
Size Instinct किसी number को context से बाहर बड़ा दिखा सकता है।
और बाकी instincts भी हमारी thinking को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए जब भी कोई बड़ा claim सुनें, तुरंत conclusion निकालने के बजाय कुछ सवाल पूछिए:
क्या यह सच है?
क्या मेरे पास इसका पूरा context है?
क्या कोई दूसरा perspective भी हो सकता है?
क्या data इस conclusion को support करता है?
यही factfulness की सबसे महत्वपूर्ण आदत है।
दुनिया को न तो जरूरत से ज्यादा अच्छा समझना चाहिए और न ही जरूरत से ज्यादा खराब।
दुनिया को जैसी है, वैसी समझने की कोशिश करनी चाहिए।
अगर आपको Factfulness Book Summary in Hindi पसंद आई हो, तो comment करके बताइए कि इन 10 instincts में से आपको अपने अंदर कौन-सा instinct सबसे ज्यादा दिखाई देता है।
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