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Personality Development 9 Mins Read

निंदा आकाश की ओर फेंके गए उस पत्थर के समान है जो लौटकर उसी पर गिरता है जिसने उसे फेंका था

Junaid ArslanBy Junaid ArslanNo Comments9 Mins Read
condemnation and your health
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निंदा (Condemnation) या आलोचना / Criticism मानव स्वभाव में तबसे पनप रही है जबसे उसने इस संसार में अपना पहला कदम रखा था। संसार में मानव की उत्पत्ति एवं विकास के बाद समाज का निर्माण अमल में आया और मानव धरती के अन्य जीवों से अलग होकर अपनी बुद्धि और विवेक का प्रदर्शन करने लगा।

वह सामाजिक प्राणी बन गया और समाज में रहने के दौरान उसने कई ऐसी चीज़ें भी ईजाद कर लीं जो उसे औरों से बिल्कुल अलग बनाती हैं। जैसे उसने वस्त्र धारण कर लिया, बोलचाल की भाषाओं में खुद को कुशल साबित किया और न्याय प्रणाली का निर्माण किया।

वह अच्छाई और बुराई के अंतर को साफतौर पर समझने लगा। इस दौरान उसने बहुत से ऐसे कानून भी बनाए जो उसके दोष और दुर्गुण को उजागर कर उसे दण्ड देने के लिए काफी हो गए। यह सभी प्रावधान उसने सामाजिक बुराईयो को दूर करने के मकसद से दिए थे। इसका असर भी हुआ।

बहुत से गुनाह जो इन्सान करता था, उस पर काफी हद तक काबू पा लिया गया और लोग सज़ा के चलते गुनाह करने से डरने लगे। लेकिन बहुत से मानव दोष या दुर्गुण ऐसे है जो भारी भरकम तो हैं लेकिन आमतौर पर उन पर किसी दण्ड का प्रावधान नहीं है जिसके चलते लोग बेरोक टोक उस गुनाह को अंजाम देते चले आ रहे हैं।

इन्हीं मानवीय दुर्गुणों में से एक दुर्गुण निंदा या किसी की शिकायत करना भी है। निंदा के ज़रिए इंसान दूसरे लोगों के खिलाफ बातें करता है और उसे दोष से भरपूर बताने का प्रयास करता रहता है। देखा जाए तो यह समाज में पनप रहा एक ऐसा जहर है जो लोगों में फासले का बीज बोकर उन्हें एक दूसरे से अलग कर रहा है।

याद रहे कि किसी की निंदा ज़्यादातर मामलों में तभी की जाती है जब अपने आपको सर्वोपरि दिखाने के चक्कर में आदमी दूसरों की इज्जत और मान सम्मान का ज़रा भी लिहाज नहीं रखता। निंदा करने वाला दूसरों की इज्जत को समाज भर में उछाल कर अपने भीतर जल रही इर्ष्या और जलन की आग को बुझाने का काम करता है।

किसी को अपनी घोर आलोचना या निंदा का निशाना बनाकर सही मायनों में वह यह दिखाने का प्रयास करता है कि समाज के दूसरे लोगों से वह किस तरह सर्वश्रेष्ठ या सर्वगुण संपन्न है।

Bad Effect of Condemnation in Hindi

लेकिन उसकी यही आदत उसकी शख्सियत की सबसे बड़ी दुश्मन भी साबित होती है। जब प्रत्येक व्यक्ति यह जान लेता है कि फलां आदमी की नजर केवल दूसरों के दोष और दुर्गुण पर होती है और उसकी अच्छाई देखने के दौरान वह अंधा हो जाता है तो ऐसे लोगों से लोग अपने आप दूरी बनाने लगते हैं। फिर एक दिन ऐसा भी आता है कि जो व्यक्ति दूसरों की निन्दा किया करता था, अब पूरा समाज ही उसे हीन भावना से देखने लग जाता है।

1. निंदा का नहीं पड़ेगा आप पर कुछ असर

समाज में पनप रही निंदा का असर ये भी देखने आता है कि लोग किसी बड़े और असाधारण काम को अंजाम तक पहुंचाने के दौरान अपने कदम ठहरा लेते हैं और ये सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि अगर मैंने ये काम किया तो लोग क्या कहेंगे?

यही विचारधार आपको पीछे ले जाने के लिए काफी है। आपको यह समझना होगा कि निंदा करने वाला शख्स केवल अपने अहंकार और घमंड के चलते दूसरे लोगों की सफलता को पचा नहीं पा रहा।

उसके मन में इर्ष्या और नफरत के बीज इतने जड़ पकड़ चुके हैं कि दूसरों की अच्छाइयां उसे नजर ही नहीं आतीं। यही वजह है कि लोगों को अपने सामने सफल होता देख कर वह नफरत की ज्वाला में दहकता रहता है।

सामने वाले की निन्दा करके वह थोड़े समय के लिए अपनी भड़ास तो निकाल लेता है लेकिन किसी को सफलता प्राप्त करने से बिल्कुल उसी तरह रोक नहीं सकता जैसे रात का अंधेरा सुबह के सूरज को निकलने से रोक नहीं सकता।

2. दूरदर्शी नहीं होते निंदा करने वाले

इंसान दुनिया का सबसे बुद्धिजीवी जीव होने का दावा तो करता है लेकिन अपने इस दावे के बावजूद वह कुछ ऐसी मूर्खता पूर्ण हरकतें करता है जिसे देखकर जानवर भी समझ जाते होंगे कि इंसान बुद्धिमान तो हो सकता है लेकिन दूरदर्शिता से उसका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।

निंदा भी उसकी इन्हीं बेवकूफी भरी हरकतों का परिणाम है। वह अपने क्षणिक सुकून के लिए लोगों की निंदा करता या फिर उनकी बेइज्जती या तौहीन करने की कोशिश तो करता है लेकिन अपनी इस बुरी हरकत (निन्दा) के दूररस बुरे नतीजों से बेखबर होता है।

यही इस बात का सबूत है कि निंदा करने वालों के पास दूरदर्शिता का अभाव होता है। निंदा से इंसान के व्यक्तित्व पर बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और वह चौतरफा जलील हो जाता है।

3. अपने व्यवहार में लाएं बदलाव

निंदा करने की एक बड़ी वजह ये भी मानी जाती है कि हम किसी के व्यवहार या बरताव से चोट खाकर उस पर पलटवार करने की अकसर कोशिश करते हैं। जब आप किसी के बुरे बरताव का जवाब देंगे तो ज़ाहिर है कि ये भी एक प्रकार की निंदा ही होगी।

तो याद रहे कि निंदा की एक विशेषता ये है कि आज नहीं तो कल वो हर हाल में निंदक (निन्दा करने वाले) के पास लौट कर आती है।

निंदा गम्भीर स्वभाव के लोगों को ज़्यादा प्रभावित करती है क्योंकि ऐसे स्वभाव के लोग दूसरों की तल्ख टिप्पणियों को अपने आत्मसम्मान (Ego) पर ले लेते हैं जिसके नतीजे में छोटी छोटी बातें या मजाक भी उनके दिल को कभी इस कदर ठेस पहुंचा देते हैं कि वर्षों वे सीधे मुंह लोगों से बात नहीं कर पाते।

कहने का मतलब ये कि गम्भीर लोगों के लिए आलोचना और भी ज़्यादा दर्दनाक और खतरनाक रुख अपना लेती है। वास्तव में गंभीरता का शुमार अच्छी आदतों में होता है। इससे व्यक्ति के बुद्धि और विवेक का पता चलता है। लेकिन अगर आप हद से ज़्यादा गम्भीर हैं तो अपने स्वभाव को थोड़ा बदलने का प्रयास करें और लोगों की टिप्पणयों पर कोई खास तवज्जो ना दें।

4. निंदा का शरीर और दिमाग पर भी पड़ता है बुरा प्रभाव

एक प्रसिद्ध महिला डॉक्टर और समाज सुधारक को हमने ये कहते हुए सुना कि एक दिन उसके यहां एक महिला मरीज़ आई जो काफी भारी भरकम और घुटने की सख़्त तकलीफ से दोचार थी।

उसके घुटनों में बहुत भयानक और असहनीय पीड़ा हो रही थी। डॉक्टर ने उसे एडमिट कर लिया। उससे वार्तालाप के दौरान जब सब कुछ सही पाया गया तो डॉक्टर ने उसके पारिवारिक माहौल के बारे में जानना चाहा। यह सुनते ही महिला मरीज़ अपने सासू मां पर बुरी तरह बरस पड़ी। डाक्टर बेहद योग्य और कुशल चिकित्सिका के रूप में जानी जाती थी और मनोवैज्ञानिक बारीकियों से भी वाकिफ थी।

उसने झट से कहा कि देखो! तुम्हारी सासू मां अब इस उम्र के लायक नहीं रहीं कि तुम उनकी निन्दा करती फिरो। अगर तुमने उनका सम्मान नहीं किया और उनकी निंदा बन्द नहीं की तो हम तुम्हारा इलाज नहीं कर पाएंगे। महिला मरीज़ इस बात पर मजबूर हो गई। फिर क्या था। डॉक्टर हर रोज़ उसे बुलाती और सासू मां के किस्से सुनती। वह मजबूरन खून का घोंट पीकर अपने सास की तारीफ करती।

कई दिनों के बाद महिला मरीज़ अपने आप ही अपने अंदर कुछ अजीबोगरीब परिवर्तन देखने लगी। डॉक्टर ने कहा कि अब तुम बिना अपचार के ही बिल्कुल स्वस्थ हो चुकी हो। मज़े की बात ये है कि जबसे उसने अपनी सासू मां से रिश्ते खुशगवार कर लिए, उसके घुटनों के ऑपरेशन का खर्च भी बच गया।

आध्यात्मिक लोग यह बात यकीन के साथ कहते चले आ रहे हैं कि जब आप किसी व्यक्ति की निन्दा या शिकायत करते हैं तो उसके सारे बुरे कर्म आपको भोगना पड़ता है और यह तजुरबाती बात है जिसे ज़िन्दगी में बहुत से लोगों ने अनुभव भी किया है।

5. पहले तोलो फिर बोलो

अक्सर मामलों में देखा जाता है कि इंसान किसी की शिकायत करने के दौरान इतना अनियंत्रित हो जाता है कि वह बोलने के बीच ये तक भूल जाता है कि सामने वाले को उसके विषाक्त शब्द कितना मानसिक दर्द और नुकसान पहुंचाते हैं।

शिकायत या निंदा करने से लोगों के आपसी सम्बन्धों पर बेहद बुरा और नकारात्मक असर पड़ता है और लंबे समय के लिए लोगों के बीच खार पैदा हो जाती है जिसे दूर कर पाना आसान नहीं रह जाता।

जब भी आपके सामने कोई किसी की शिकायत करे तो उसे रोकने के लिए आप उस शख्स की तारीफ करने लगें जिसकी वह बुराई कर रहा है। इससे होगा ये कि निंदा करने वाले का न सिर्फ मूंह ही नहीं टूटेगा बल्कि वो आपके सामने किसी शख्स की शिकायत करने से भी संकोच महसूस करेगा।

बोलने से पहले या बीच में अगर आपको लगे कि आप स्वयं किसी की बुराइयों की ओर झुकने लगे हैं तो अपनी बात बदल कर फौरन उस व्यक्ति की अच्छाइयों को भी बयान कर दें ताकि मामला संतुलित हो जाए और आपकी अंतरात्मा पर निंदा करने के बाद कोई बोझ ना रहे।

6. सकारात्मक पहलुओं पर फोकस करें

ये जानते हुए कि आपके साथ दुनिया के तमामतर इंसान गलती और चूक करते हैं और सबके भीतर कुछ न कुछ सगुण और दुर्गुण मौजूद होते हैं, लोगों की अच्छाइयों पर ध्यान देने की कोशिश करते रहें।

ज़िन्दगी में कोई दूध का धुला नहीं है। हर किसी में कोई ना कोई अच्छाई या बुराई पाई जाती है। फिर हम जाने क्यों लोगों की बुराईयों पर ही फोकस करके अपनी ऊर्जा खराब करते हैं। वैसे देखा जाए तो निंदा करने के दौरान तो दिल को बड़ा आनन्द मिलता है कि चलो फलां आदमी बेइज्जत हो रहा है लेकिन इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।

इसलिए हर व्यक्ति की खूबियों पर नजर रखकर हमें उसकी निंदा या शिकायत से बचना चाहिए और उस दर्द को महसूस करना चाहिए जो अपनी शिकायत सुनने के बाद हमें मिलता है।

बुरे लोगों के पास भी कुछ गुण ऐसे होते हैं कि उनकी सारी बुराइयों को ढांक सकते हैं।

इसलिए किसी की बुराई करने से पहले एक बार यह अवश्य सोच लें कि निन्दा आकाश में उछाला गया वो पत्थर है जो उछालने वाले के पास वापस लौट आता है। इसलिए जीवन में सकारात्मक बनें और दूसरों के चक्कर में न पड़कर अपनी चिंता में लीन रहें।

उम्मीद है कि यदि इस बात पर समाज अमल करने लगे तो इस भयानक सामाजिक महामारी का अंत हो जाए।

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Junaid Arslan
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लेखक, वरिष्ठ संवाददाता व पत्रकार @ "कुशल व्यवहार" (निष्पक्ष हिन्दी साप्ताहिक), उत्तर प्रदेश

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