चाणक्य नीति Chapter 8 में आचार्य चाणक्य ने सम्मान, धन, विद्या, दान, संतोष, सत्य, परिवार और जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण विचार बताए हैं। इस अध्याय में व्यक्ति के व्यवहार और उसके जीवन में सही मूल्यों के महत्व पर भी जोर दिया गया है।
आचार्य चाणक्य एक महान राजनीतिज्ञ थे और यह बात बहुत से लोग मानते हैं। चाहे प्राचीन काल हो या आज का युग, लोग जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में सफल होने के लिए चाणक्य द्वारा बताए गए सिद्धांतों को पढ़ते हैं। चाणक्य नीति में व्यक्ति अपने रिश्तों को कैसे सफल बनाए और सगे-संबंधियों के साथ किस तरह संबंध बनाए रखे, जैसे विषयों पर भी विचार मिलते हैं।
इससे पहले आप चाणक्य नीति Chapter 7 भी पढ़ सकते हैं। अब आइए जानते हैं चाणक्य नीति अष्टम अध्याय के महत्वपूर्ण विचार।
चाणक्य नीति Chapter 8
1. सम्मान और धन में किसे अधिक महत्व देना चाहिए?
अधम, नीच और छोटे व्यक्ति इस संसार में धन को ही महत्व देते हैं। बीच के, अर्थात मध्यम स्तर के व्यक्ति धन के साथ मान-सम्मान को भी महत्व देते हैं। इन दोनों के विपरीत उत्तम पुरुष धन की अपेक्षा सम्मान प्राप्ति को अधिक महत्व देते हैं। उनके जीवन का लक्ष्य सम्मान प्राप्त करना होता है और इसे ही वे सबसे बड़ा धन समझते हैं।
Low class men desire wealth; middle class men both wealth and respect; but the noble, honor only; hence honor is the noble man’s true wealth.
सीख: धन जीवन के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन सम्मान, चरित्र और अच्छी प्रतिष्ठा का महत्व भी बहुत बड़ा है।
2. कुछ खाद्य पदार्थ लेने के बाद भी नित्य कर्म किए जा सकते हैं
गन्ना और गन्ने का रस, पानी, दूध, जड़ी-बूटी, पान, फल तथा औषध आदि का सेवन करने के उपरान्त भी संध्यापूजन, दान-तर्पण आदि नित्य कर्म किए जा सकते हैं।
One can do charitable work and bathing even after having cane, water, milk, edible roots, pan, fruits and medicine.
यह विचार प्राचीन धार्मिक आचार-विचार से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसे उसी ऐतिहासिक संदर्भ में समझना उचित है।
3. भोजन और संतान के बारे में प्राचीन विचार
दीपक अंधेरा खाता है अर्थात उसे दूर करता है और उससे काजल पैदा होता है। इसी प्रकार उत्तम संतान को जन्म देने के लिए मनुष्य को ईमानदारी से कमाया हुआ शुद्ध और सात्विक अन्न ही खाना चाहिए।
Light of lamp destroys darkness but produces soot. Similarly whatever one eats its good or bad qualities are reproduced in one’s children.
ध्यान दें: यह प्राचीन ग्रंथ का विचार है। भोजन का सीधे संतान के अच्छे या बुरे चरित्र में बदल जाना आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता। इस कथन की मूल सीख ईमानदारी से कमाए गए और शुद्ध भोजन के महत्व से जुड़ी है।
4. “यवन” के बारे में प्राचीन कथन
मूल चाणक्य नीति में यवन और धर्म-विरोधी व्यक्ति के बारे में बहुत कठोर भाषा का प्रयोग किया गया है। इसमें कहा गया है कि उससे पूरी तरह दूर रहना चाहिए।
Sages say a yavan (foreigner) is equal to thousands of scavengers.
नोट: “यवन” शब्द का अर्थ अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भों में अलग समूहों के लिए इस्तेमाल हुआ है। इसे आज किसी विदेशी, समुदाय या धर्म के प्रत्येक व्यक्ति के बारे में सामान्य नियम के रूप में नहीं समझना चाहिए। यह प्राचीन पाठ का संदर्भ है।
5. योग्य व्यक्ति को दिया गया दान अधिक उपयोगी होता है
समुद्र ने गुणी मेघ को जल का दान करके एक ओर अपने खारे जल को मीठा बना दिया। दूसरी ओर जड़-चेतन को जीवन प्रदान करने का पुण्य भी अर्जित किया और दिए गए जल से अधिक परिणाम में जल फिर प्राप्त कर लिया।
इस प्रकार स्पष्ट है कि गुणी को दिया गया दान ही सफल होता है। अतः गुणवान को ही दान देना चाहिए।
Give your wealth only to the worthy and never to others. The water of the sea received by the clouds is always sweet. The rainwater enlivens all living beings of the earth and then returns to the ocean where its value is multiplied a million fold.
सीख: चाणक्य यहां दान को सोच-समझकर और उचित व्यक्ति या उचित कार्य के लिए करने की बात करते हैं।
6. स्नान और शुद्धता से जुड़ा प्राचीन नियम
तेल की मालिश करने पर, चिता का धुआं लगने पर, संभोग करने तथा हजामत बनवाने के बाद व्यक्ति जब तक स्नान नहीं कर लेता, तब तक वह अस्पर्श्य अर्थात अपवित्र रहता है। इन स्थितियों में स्नान से ही व्यक्ति की शुद्धि होने की बात कही गई है।
After oil massage, after attending a funeral, after sex, and after hair cut, one is dirty until one has taken a bath.
नोट: यह प्राचीन शुद्धता और धार्मिक आचार से जुड़ा हुआ कथन है। इसे आज के समय में चिकित्सा संबंधी सार्वभौमिक नियम के रूप में नहीं समझना चाहिए।
7. भोजन के समय पानी पीने के बारे में कथन
अपच में, भोजन पच जाने पर तथा भोजन के बीच पानी का सेवन लाभप्रद बताया गया है। लेकिन भोजन समाप्त करते ही अधिक पानी पीना हानिकारक कहा गया है। अतः ऐसा नहीं करना चाहिए।
Water is the medicine for indigestion; it is invigorating when the food that is eaten is well digested; it is like nectar when drunk in the middle of a dinner; and it is like poison when taken at the end of a meal.
नोट: यह चाणक्य नीति में दिया गया पारंपरिक कथन है। पानी पीने का सही समय और मात्रा व्यक्ति की स्थिति, स्वास्थ्य और परिस्थितियों पर निर्भर कर सकती है।
8. ज्ञान का उपयोग नहीं किया तो उसका लाभ नहीं
यदि व्यक्ति ज्ञान के अनुरूप आचरण नहीं करता, तो वह ज्ञान व्यर्थ है। अज्ञानी मनुष्य का जीवन व्यर्थ है। सेनापति के बिना सेना व्यर्थ है और पुरुष अर्थात पति के बिना स्त्री का जीवन व्यर्थ है, ऐसा मूल चाणक्य नीति में कहा गया है।
Knowledge is lost without putting it into practice; a man is lost due to ignorance; an army is lost without a commander; and a woman is lost without a husband.
आज के संदर्भ में: ज्ञान का वास्तविक लाभ तभी है जब व्यक्ति उसे अपने व्यवहार में लागू करे। वहीं स्त्री के जीवन को केवल पति पर निर्भर बताने वाला हिस्सा प्राचीन सामाजिक सोच को दर्शाता है। आधुनिक जीवन में व्यक्ति की पहचान और आत्मनिर्भरता केवल वैवाहिक स्थिति पर निर्भर नहीं होती।
9. वृद्धावस्था में कुछ परिस्थितियां बहुत दुखद हो सकती हैं
बुढ़ापे में पत्नी का मर जाना, भाई-बन्धुओं द्वारा धन का हड़प लेना तथा भोजन के लिए दूसरे के अधीन रहना—ये तीनों बातें पुरुषों के लिए अत्यंत दुखदायी बताई गई हैं।
A man who encounters the following three is unfortunate; the death of his wife in his old age, the entrusting of money into the hands of relatives, and depending upon others for food.
इस नीति का मुख्य भाव कठिन परिस्थितियों और आर्थिक निर्भरता से बचने की आवश्यकता को समझना है।
10. देवमूर्ति की पूजा में श्रद्धा का महत्व
लकड़ी, पत्थर और धातु—सोना, चांदी, तांबा, पीतल आदि की बनी देवमूर्ति में देव-भावना अर्थात देवता को साक्षात रूप से विद्यमान समझकर श्रद्धा सहित उसकी पूजा करनी चाहिए।
जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता है, श्री विष्णुनारायण की कृपा से उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होने की बात कही गई है।
Chanting of the Vedas without making ritualistic sacrifices to the Supreme Lord through the medium of Agni, and sacrifices not followed by bountiful gifts are futile. Perfection can be achieved only through devotion for devotion is the basis of all success.
यह मूल रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक विचार है। इसे आस्था और भक्ति के संदर्भ में समझना उचित है।
11. शांति, संतोष, तृष्णा और दया
शांति अर्थात आवेग और उद्वेग पर काबू पाने के समान दूसरा कोई उत्कृष्ट तप नहीं है। संतोष अर्थात सहज में प्राप्त वस्तु से प्रसन्नता जैसा कोई दूसरा सुख नहीं है। तृष्णा अर्थात अधिक से अधिक पाने की चाह जैसा दूसरा कोई घटिया और दुख देने वाला रोग नहीं है।
दया अर्थात दूसरों के दुःख से द्रवित होने जैसा कोई बढ़िया दूसरा धर्म नहीं है।
There is no austerity equal to a balanced mind, and there is no happiness equal to contentment; there is no disease like covetousness, and no virtue like mercy.
सीख: मन की शांति, संतोष और दया को जीवन के महत्वपूर्ण गुण माना गया है।
जीवन में संतोष और सकारात्मक सोच पर आप Life में कभी बुरा वक्त नहीं आता भी पढ़ सकते हैं।
12. रूप, कुल, विद्या और धन की शोभा किससे होती है?
रूप की शोभा गुणों से होती है। कुल की शोभा शील अर्थात अच्छे आचरण से होती है। विद्या की शोभा धन प्राप्ति से होती है। इसी प्रकार धन की शोभा उसके भोगने से होती है।
Moral excellence is an ornament for personal beauty; righteous conduct, for high birth; success for learning; and proper spending for wealth.
इसका सरल अर्थ है कि केवल सुंदरता, परिवार या ज्ञान का होना पर्याप्त नहीं है। उसके साथ गुण, अच्छा आचरण और सही उपयोग भी जरूरी है।
13. उपयोग में न आने वाली चीजें व्यर्थ हो जाती हैं
गुणहीन पुरुष की सुंदरता, दुराचारी पुरुष का उच्च कुल में उत्पन्न होना, आजीविका सुलभ न कराने वाली विद्या और उपभोग में न आने वाला धन व्यर्थ ही है। इनकी कोई उपयोगिता और महत्व नहीं रह जाता।
Beauty is spoiled by an immoral nature; noble birth by bad conduct; learning, without being perfected; and wealth by not being properly utilized.
सीख: किसी भी चीज का मूल्य तभी है जब उसका सही उपयोग हो। ज्ञान के साथ कौशल और धन के साथ उचित उपयोग जरूरी है।
14. शुद्धता और संतोष से जुड़े उदाहरण
पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाला जल शुद्ध-पवित्र माना गया है। पतिव्रता स्त्री को शुद्ध-पवित्र कहा गया है। प्रजा का कल्याण करने वाला राजा पवित्र अथवा श्रेष्ठ माना गया है। संतोषी यानी सहज प्राप्ति में प्रसन्न रहने वाले ब्राह्मण को भी शुद्ध-पवित्र बताया गया है।
संतोष सभी के लिए उत्तम बताया गया है।
Water seeping into the earth is pure; and a devoted wife is pure; the king who is the benefactor of his people is pure; and pure is the Brahman who is contented.
यहां भी कुछ बातें प्राचीन धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं।
15. अलग-अलग भूमिकाओं के लिए अलग गुणों का पुराना विचार
ब्राह्मण को संतोषी, राजा को महत्वाकांक्षी, वेश्या को निर्लज्ज और परिवार की सद्गृहस्थ स्त्री को शील-संकोच की देवी होना चाहिए, ऐसा मूल चाणक्य नीति में कहा गया है।
Discontented Brahmanas, contented kings, shy prostitutes, and immodest housewives are ruined.
ध्यान दें: यह प्राचीन सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ कथन है। आधुनिक समाज में किसी व्यक्ति के गुण केवल उसकी जाति, पेशे या लिंग के आधार पर तय नहीं किए जा सकते।
16. महत्व विद्या का है, केवल वंश का नहीं
चाणक्य नीति में विद्या को वंश से अधिक महत्व देने की बात कही गई है। यदि वंश भी श्रेष्ठ हो और व्यक्ति विद्वान तथा चरित्रवान भी हो, तो वह निश्चित रूप से उत्कृष्ट और आदरणीय माना जाता है।
शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि विद्या से रहित व्यक्ति पशु के समान है।
Of what avail is a high birth if a person is destitute of scholarship? A man who is of low extraction is honored even by the demigods if he is learned.
सीख: व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके ज्ञान, योग्यता और चरित्र से बनती है।
17. विद्वान व्यक्ति का हर जगह सम्मान होता है
चाणक्य कहते हैं कि इस संसार में विद्वान की ही प्रशंसा और विद्वान की ही सब कहीं पूजा होती है। वस्तुतः विद्या से संसार की कई दुर्लभ वस्तुएं भी प्राप्त हो सकती हैं। यही कारण है कि इस संसार में विद्या और विद्वान का सब जगह आदर-सम्मान होता है।
A learned man is honored by the people. A learned man commands respect everywhere for his learning. Indeed, learning is honored everywhere.
विद्या के महत्व पर आप भारत का सबसे बुद्धिमान और पढ़ा-लिखा व्यक्ति Shrikant Jichkar के बारे में भी पढ़ सकते हैं।
18. विवेकहीन जीवन के बारे में कठोर कथन
भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार त्यागकर मांस खाने वाले, मदिरा पीने वाले, निरक्षर और अनपढ़ व्यक्ति को मूल चाणक्य नीति में मनुष्य के रूप में पशु कहा गया है। इसमें कहा गया है कि ऐसी चेष्टाएं विवेक के बिना होती हैं और ऐसे मनुष्य धरती पर भार के समान हैं।
The earth is encumbered with the weight of the flesh-eaters, wine-bibblers, dolts and blockheads, who are beasts in the form of men.
नोट: यह प्राचीन नीति का कठोर कथन है। इसे आज किसी व्यक्ति के मानव-मूल्य का वैज्ञानिक या सार्वभौमिक मापदंड नहीं मानना चाहिए। यहां मुख्य विचार विवेक और अच्छे आचरण के महत्व पर है।
19. यज्ञ के सही तरीके से होने का महत्व
मानव-समाज के लिए यज्ञ को महान उपकारक बताया गया है। मूल विचार में कहा गया है कि यज्ञ बादलों को जन्म देकर अन्न और धन-धान्य की बढ़ोतरी करता है। लेकिन यदि उसमें सावधानी न बरती जाए, उसे ठीक ढंग से न किया जाए और उसके संपादन में त्रुटियां रह जाएं, तो वह शत्रु के समान हानिकारक भी हो सकता है।
इसी तरह यदि पुरोहित यज्ञ में ठीक से उच्चारण न करे तो यज्ञ उसे नुकसान पहुंचाता है। और यदि यजमान लोगों को दान या भेंट की वस्तु न दे, तो वह भी यज्ञ से संबंधित नियमों के कारण नुकसान उठाता है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
There is no enemy like a yajna (sacrifice) which consumes the kingdom when not attended by feeding on a large scale; consumes the priest when the chanting is not done properly; and consumes the yajaman when the gifts are not made.
यह प्राचीन वैदिक और धार्मिक अनुष्ठान की परंपरा से जुड़ा विचार है।
चाणक्य नीति Chapter 8 की प्रमुख सीख
चाणक्य नीति Chapter 8 के इन विचारों में कुछ बातें आज भी व्यवहारिक जीवन में उपयोगी लगती हैं। वहीं कुछ कथन प्राचीन धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था को दर्शाते हैं।
- धन के साथ सम्मान और अच्छे चरित्र को भी महत्व देना चाहिए।
- संकट या समस्या आने पर सही निर्णय और सावधानी जरूरी है।
- ज्ञान तभी उपयोगी है जब उसे व्यवहार में उतारा जाए।
- विद्या को जीवन की महत्वपूर्ण संपत्ति समझना चाहिए।
- अच्छे आचरण से व्यक्ति की प्रतिष्ठा बढ़ती है।
- संतोष और मानसिक शांति जीवन में महत्वपूर्ण हैं।
- तृष्णा और अनियंत्रित लालच से बचना चाहिए।
- धन का उचित उपयोग करना चाहिए।
- दान सोच-समझकर और उचित स्थान पर करना चाहिए।
- दया और परोपकार को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।
- प्राचीन नीतियों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए।
चाणक्य नीति Chapter 8 से आज क्या सीखें?
इस अध्याय में कई ऐसे विचार हैं जिन्हें आज के जीवन में व्यावहारिक रूप से अपनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, केवल ज्ञान होने से कुछ नहीं होता। उसे अपने काम और व्यवहार में लागू करना भी जरूरी है। इसी तरह धन का सही उपयोग, संतोष और दया व्यक्ति के जीवन को बेहतर बना सकते हैं।
इसके अलावा, व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि हर प्राचीन कथन आज के समाज में शब्दशः लागू नहीं हो सकता। कुछ बातें उस समय की सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक मान्यताओं और पारिवारिक भूमिकाओं से जुड़ी हुई थीं। इसलिए उनकी मूल सीख को समझकर वर्तमान जीवन में लागू करना बेहतर है।
विशेष रूप से विद्या को वंश से अधिक महत्व देने और अच्छे आचरण को व्यक्ति की पहचान मानने वाला विचार आज भी सोचने योग्य है।
चाणक्य नीति के अन्य अध्याय पढ़ें
अगर आपको चाणक्य नीति Chapter 8 के ये विचार पसंद आए हैं, तो आप इसके अन्य अध्याय भी पढ़ सकते हैं:
- चाणक्य नीति Chapter 1 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 2 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 3 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 4 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 5 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 6 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 7 In Hindi
आप सम्पूर्ण चाणक्य नीति हिंदी में भी पढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष
चाणक्य नीति Chapter 8 में सम्मान, धन, विद्या, दान, संतोष, सत्य, धर्म और अच्छे आचरण से जुड़े अनेक विचार दिए गए हैं। कुछ विचार आज के जीवन में भी सीधे उपयोगी दिखाई देते हैं, जबकि कुछ कथन प्राचीन समाज की सोच को दर्शाते हैं।
इस अध्याय की सबसे उपयोगी सीख यह है कि धन के साथ सम्मान और चरित्र को भी महत्व देना चाहिए। ज्ञान को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उसे व्यवहार में लाना चाहिए। इसी तरह संतोष, दया, उचित दान और अच्छे आचरण को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।
अंततः चाणक्य नीति को पढ़ते समय हर कथन को उसके समय और संदर्भ के साथ समझना जरूरी है। जो सीख आज भी उचित और उपयोगी है, उसे अपने जीवन में अपनाया जा सकता है।
Note: सावधानी बरतने के बावजूद यदि ऊपर दिए गए किसी भी Quote (Hindi or English) में आपको कोई त्रुटि मिले तो कृपया comments के माध्यम से अवगत कराएं।
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