चाणक्य नीति Chapter 7 में आचार्य चाणक्य ने संतोष, धन, मित्रता, समय, व्यवहार, संगति और जीवन में सावधानी से जुड़े कई महत्वपूर्ण विचार बताए हैं। इस अध्याय में कुछ नीतियां व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों का सामना करने और अपने जीवन में सही निर्णय लेने की सीख देती हैं।
आचार्य चाणक्य की नीतियों में कुल सत्रह अध्याय हैं। इन नीतियों में जीवन और व्यवहार से जुड़ी अनेक बातें बताई गई हैं। इन्हें पढ़कर व्यक्ति अपने जीवन में कई बातों पर विचार कर सकता है। इसी क्रम में यहां चाणक्य नीति का सातवां अध्याय प्रस्तुत किया जा रहा है।
इससे पहले आप चाणक्य नीति Chapter 6 भी पढ़ सकते हैं। अब आइए जानते हैं चाणक्य नीति सप्तम अध्याय के महत्वपूर्ण विचार।
चाणक्य नीति Chapter 7
1. बुद्धिमान व्यक्ति अपनी निजी परेशानी हर किसी को नहीं बताता
बुद्धिमान व्यक्ति वही है जिसमें कुछ सहन-शक्ति हो। वह अपने धन के नष्ट होने से प्राप्त दुःख, दुश्चरित्र पत्नी अथवा किसी व्यक्ति द्वारा ठगे जाने और नीच शब्दों का प्रयोग किए जाने से हुए दुःख को किसी से प्रकट नहीं करता।
A wise man should not reveal his loss of wealth, the vexation of his mind, the misconduct of his own wife, base words spoken by others, and disgrace that has befallen him.
इस नीति का मुख्य संदेश यह है कि अपनी निजी समस्याओं और कमजोरियों को हर व्यक्ति के सामने साझा करने से बचना चाहिए। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति को गंभीर परेशानी में कभी मदद नहीं मांगनी चाहिए। भरोसेमंद व्यक्ति से सहायता लेना जरूरी हो सकता है।
2. धन, विद्या और लेन-देन में संकोच नहीं करना चाहिए
जो व्यक्ति धन-धान्य के लेन-देन में, विद्या अथवा किसी प्रकार के हुनर को सीखने में, खाने-पीने और हिसाब-किताब में संकोच नहीं करते, वे सुखी रहते हैं।
He who gives up shyness in monetary dealings, in acquiring knowledge, in eating and in business, becomes happy.
इसका सरल अर्थ है कि जरूरत की बात पूछने, सीखने और उचित लेन-देन करने में अनावश्यक शर्म नहीं करनी चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने में संकोच करना व्यक्ति के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
3. संतोष से मन को शांति मिलती है
जो व्यक्ति संतोषरूपी अमृत से तृप्त हैं और शांतचित्त रहते हैं, उनसे बढ़कर सुखी कौन हो सकता है? धन के लोभ में इधर-उधर भागने वाले व्यक्ति को शांति कहां प्राप्त हो सकती है? ऐसे व्यक्ति सदैव तनावपूर्ण स्थिति में रहते हैं।
The happiness and peace attained by those satisfied by the nectar of spiritual tranquility is not attained by greedy persons restlessly moving here and there.
सीख: अधिक पाने की इच्छा जीवन को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती है, लेकिन असीम लोभ मानसिक शांति छीन सकता है। इसलिए मेहनत के साथ संतोष का संतुलन भी जरूरी है।
4. किन बातों में संतोष और किनमें नहीं?
व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी स्त्री से ही संतोष करे। इसी प्रकार उसे अपने भोजन से भी संतोष करना चाहिए तथा आजीविका से प्राप्त धन में भी मनुष्य को संतोष करना चाहिए।
इसके विपरीत शास्त्रों के अध्ययन, प्रभु के नाम का स्मरण और दान-कार्य में कभी संतोष नहीं करना चाहिए। इन तीनों को अधिक से अधिक करने की इच्छा करनी चाहिए।
One should feel satisfied with the following three things; his own wife, food given by Providence and wealth acquired by honest effort; but one should never feel satisfied with the following three; study, chanting the holy names of the Lord (Japa) and charity.
यह विचार संतोष और निरंतर सीखने के बीच संतुलन की बात करता है। जीवन की मूल जरूरतों में संतोष रखें, लेकिन ज्ञान, आध्यात्मिक अभ्यास और दान जैसे कार्यों में आगे बढ़ने की इच्छा रखें।
5. कुछ संबंधों और वस्तुओं के बीच से नहीं गुजरना चाहिए
दो ब्राह्मणों, अग्नि और ब्राह्मण, पति और पत्नी, स्वामी और सेवक तथा हल और बैल के बीच में से नहीं गुजरना चाहिए।
Do not pass between two Brahmanas, between a brahmana and his sacrificial fire, between a wife and her husband, a master and his servant, and a plow and an ox.
यह प्राचीन सामाजिक और धार्मिक व्यवहार से जुड़ी नीति है। इसका मुख्य भाव यह है कि कुछ कार्यों और संबंधों के बीच अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
6. कुछ लोगों और वस्तुओं का सम्मान करना चाहिए
अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कुमारी कन्या, बूढ़े और बच्चे को कभी पैर नहीं लगाना चाहिए। उन्हें पैर से छूना अनुचित बताया गया है।
Do not let your foot touch fire, the spiritual master or a brahmana; it must never touch a cow, a virgin, an old person, or a child.
यह प्राचीन भारतीय सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में सम्मान से जुड़ा विचार है। आज इसे मूल रूप से बड़ों, गुरु और अन्य लोगों के प्रति सम्मान रखने की सीख के रूप में समझा जा सकता है।
7. दुष्ट व्यक्ति से दूरी बनाकर रखें
बैलगाड़ी से पांच हाथ, घोड़े से दस हाथ और हाथी से दस हाथ दूर रहने की बात कही गई है। किन्तु दुष्ट व्यक्ति से बचने के लिए थोड़ा-बहुत अंतर पर्याप्त नहीं बताया गया। उसके लिए आवश्यकता पड़े तो देश भी छोड़ने की बात कही गई है।
Keep one thousand cubits away from an elephant, a hundred from a horse, ten from a horned beast, but keep away from the wicked by leaving the country.
सीख: जिस व्यक्ति का व्यवहार लगातार नुकसान पहुंचाता हो, उससे उचित दूरी बनाए रखना समझदारी हो सकती है।
8. दुष्ट व्यक्ति को वश में करने का कठोर प्राचीन कथन
हाथी को चलाने के लिए अंकुश, घोड़े के लिए हाथ में चाबुक और सींग वाले पशु के लिए डंडे की आवश्यकता बताई गई है। लेकिन दुष्ट व्यक्ति के बारे में मूल नीति में बहुत कठोर भाषा का प्रयोग हुआ है और उसे तलवार के माध्यम से वश में करने की बात कही गई है।
An elephant is controlled by a goad (Ankush), a horse by a slap of the hand, a horned animal with the show of a stick, and a rascal with a sword.
महत्वपूर्ण: यह प्राचीन ग्रंथ का कठोर कथन है। आज के समय में किसी व्यक्ति को हिंसा या हत्या के माध्यम से “सीधे रास्ते पर लाने” की सलाह उचित नहीं है। आधुनिक समाज में कानून और शांतिपूर्ण तरीके अपनाना चाहिए।
9. कौन किस चीज से प्रसन्न होता है?
ब्राह्मण केवल भोजन से तृप्त हो जाते हैं और मोर बादल के गरजने भर से संतुष्ट हो जाता है। संत और सज्जन व्यक्ति दूसरे की समृद्धि देखकर प्रसन्न होते हैं। वहीं दुष्ट व्यक्ति को प्रसन्नता तभी होती है, जब वह किसी दूसरे को संकट में पड़ा हुआ देखता है।
Brahmanas find satisfaction in a good meal, peacocks in the peal of thunder, a sadhu in seeing the prosperity of others, and the wicked in the misery of others.
इस नीति का सबसे उपयोगी हिस्सा यह है कि अच्छे व्यक्ति को दूसरों की सफलता देखकर प्रसन्न होना चाहिए। ईर्ष्या और दूसरे की परेशानी से खुशी मिलना नकारात्मक प्रवृत्ति है।
10. परिस्थिति के अनुसार विनय या शक्ति का प्रयोग करें
यदि शत्रु अपने से अधिक बलवान हो तो उसके साथ विनय का व्यवहार करना चाहिए। दुष्ट शत्रु को बल-प्रयोग द्वारा वश में करने की बात कही गई है। समान शक्ति वाले व्यक्ति के साथ परिस्थिति के अनुसार विनय या बल का उपयोग करने का विचार दिया गया है।
Conciliate a strong man by submission, a wicked man by the opposition, and the one whose power is equal to yours by politeness or force.
इसका व्यवहारिक संदेश यह है कि हर परिस्थिति में एक ही तरीका अपनाना उचित नहीं होता। परिस्थिति को समझकर प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
11. शक्ति के बारे में चाणक्य का प्राचीन विचार
राजा की शक्ति उसका बाहुबल, ब्राह्मण की शक्ति उसका तत्वज्ञान और स्त्रियों की शक्ति उनका सौंदर्य एवं मधुरता बताई गई है।
The power of a king lies in his mighty arms; that of a brahmana in his spiritual knowledge; and that of a woman in her beauty youth and sweet words.
यह कथन प्राचीन सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। आज किसी व्यक्ति की शक्ति या क्षमता को केवल लिंग, बाहरी सुंदरता या सामाजिक भूमिका से तय करना उचित नहीं है। शिक्षा, कौशल, अनुभव, चरित्र और निर्णय लेने की क्षमता भी महत्वपूर्ण हैं।
12. जरूरत से ज्यादा सीधा होना भी उचित नहीं
व्यक्ति को इतना अधिक सरल और सीधा नहीं होना चाहिए कि जो भी चाहे उसे धोखा दे सके। जंगल में जाकर देखिए कि सीधे खड़े हुए वृक्षों को मनुष्य अपने काम के लिए जल्दी काट लेता है और टेढ़े-मेढ़े वृक्षों को छोड़ देता है।
Do not be very upright in your dealings for you would see by going to the forest that straight trees are cut down while crooked ones are left standing.
सीख: ईमानदार रहना जरूरी है, लेकिन अपनी सीमाओं और सुरक्षा को समझना भी उतना ही जरूरी है। भोलापन और ईमानदारी एक ही बात नहीं हैं।
13. हर रिश्ता परिस्थिति के अनुसार नहीं बदलना चाहिए
जिस तालाब में पानी अधिक होता है, हंस वहीं निवास करते हैं। यदि वहां का पानी सूख जाता है, तो वे उसे छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। जब वर्षा अथवा नदी से उसमें फिर पानी भर जाता है, तो वे लौट आते हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि मनुष्य को हंस के समान व्यवहार नहीं करना चाहिए। मैत्री या संबंध स्थापित करने के बाद उन्हें बार-बार भंग करना उचित नहीं है। अपने आश्रयदाता को बार-बार छोड़ना और फिर लौटकर आना मानवता का लक्षण नहीं बताया गया है।
Swans live wherever there is water, and leave the place where water dries up; let not a man act so and comes and goes as he pleases.
आज के संदर्भ में इसका अर्थ यह समझा जा सकता है कि केवल लाभ देखकर रिश्ते बनाना और फिर लाभ खत्म होते ही उन्हें छोड़ देना उचित नहीं है।
14. जमा हुए धन का सदुपयोग करें
बहुत समय से पानी से भरे हुए तालाब को सड़ांध, दुर्गन्ध और कीचड़ से बचाने के लिए उसके पानी को बदलना आवश्यक है। इसी प्रकार बहुत यत्न से जोड़े हुए धन को भी दान देने और उचित उपयोग करने से ही बचाया जा सकता है।
Accumulated wealth is saved by spending just as incoming fresh water is saved by letting out stagnant water.
इसका मुख्य विचार यह है कि धन को केवल जमा करके रखना ही पर्याप्त नहीं है। उसका सही और जरूरत के अनुसार उपयोग भी होना चाहिए।
15. धरती पर दिव्य गुणों वाले व्यक्ति की पहचान
स्वर्ग से भूलोक पर उतरे हुए दिव्य पुरुष जब जन्म लेते हैं, तो उनकी पहचान चार प्रमुख गुणों से होने की बात कही गई है। उनमें दान देने की प्रवृत्ति होती है। वे सदैव मधुर और मीठी वाणी बोलते हैं। वे देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन तथा वस्त्र आदि देकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।
The following four characteristics of the denizens of heaven may be seen in the residents of this earth planet; charity, sweet words, worships of the Supreme Personality of Godhead, and satisfying the needs of Brahmanas.
आज के संदर्भ में इसके उपयोगी हिस्से को दान, मधुर व्यवहार और दूसरों की सहायता करने की प्रवृत्ति के रूप में समझा जा सकता है।
16. कौन-सी आदतें जीवन में नरक जैसा दुख देती हैं?
अत्यंत क्रोध करना, कड़वी वाणी बोलना, दरिद्रता और अपने सगे-संबंधियों से वैर-विरोध करना, नीच पुरुषों का संग करना तथा छोटे कुल के व्यक्ति की नौकरी या सेवा करना—इन बातों को चाणक्य नीति में ऐसे दुर्गुण बताया गया है जिनसे पृथ्वीलोक में ही नरक के दुखों का आभास हो जाता है।
The following qualities of the denizens of hell may characterize men on earth; extreme wrath, harsh speech, enmity with one’s relations, the company with the base, and service to men of low extraction.
ध्यान दें: यहां “छोटे कुल” जैसी भाषा प्राचीन सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है। आज किसी व्यक्ति की योग्यता या सम्मान को जन्म अथवा सामाजिक पृष्ठभूमि से तय करना उचित नहीं है। इस नीति का उपयोगी संदेश क्रोध, कटु वाणी और गलत संगति से बचने का है।
17. अच्छे और साहसी लोगों की संगति का लाभ
व्यक्ति कभी सिंह की गुफा में पहुंच जाए तो संभव है कि हाथी के मस्तक की मणि, जिसे गजमुक्ता कहा जाता है, भी मिल जाए। लेकिन यदि वह गीदड़ की मांद में चला जाए, तो उसे बछड़े की पूंछ अथवा गधे के चमड़े के सूखे टुकड़ों के सिवाय और कुछ नहीं मिलेगा।
अर्थात साहसी और शूरवीरों की संगति में खतरा होने पर भी दुर्लभ रत्न मिल सकते हैं। इसके विपरीत ठग और कायर लोगों की संगति से कुछ अच्छा प्राप्त नहीं होता।
By going to the den of a lion pearls from the head of an elephant may be obtained; but by visiting the hole of a jackal nothing but the tail of a calf or a bit of the hide of an ass may be found.
सीख: संगति व्यक्ति के विचार और अवसरों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए अच्छे, मेहनती और साहसी लोगों के साथ रहना उपयोगी हो सकता है।
18. विद्या के बिना जीवन अधूरा है
जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ न तो उसके शरीर के गुप्त अंगों को ढकती है और न ही उसे मच्छरों के काटने से बचा सकती है, उसी प्रकार विद्या से रहित जीवन भी व्यर्थ बताया गया है। विद्या-विहीन मनुष्य मूर्ख होने के कारण न अपनी रक्षा कर सकता है और न अपना भरण-पोषण।
The life of an uneducated man is as useless as the tail of a dog, which neither covers its rear end, nor protects it from the bites of insects.
आज के संदर्भ में इस नीति की सीख शिक्षा और कौशल के महत्व से जुड़ी है। ज्ञान व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने में मदद कर सकता है।
विद्या के महत्व पर आप शिक्षा का जीवन में महत्व भी पढ़ सकते हैं।
19. सच्ची पवित्रता केवल बाहरी नहीं होती
बोलचाल अथवा वाणी में पवित्रता, मन की स्वच्छता और इन्द्रियों को वश में रखने का भी कोई महत्व नहीं, जब तक मनुष्य के मन में जीवमात्र के लिए दया की भावना उत्पन्न नहीं होती। चाणक्य नीति में कहा गया है कि परोपकार ही सच्ची पवित्रता है।
The purity of speech, of the mind, of the senses, and a compassionate heart are needed by one who desires to rise to the divine platform.
सीख: केवल अच्छी बातें करना पर्याप्त नहीं है। दूसरों के प्रति दया, करुणा और सहायता की भावना भी जरूरी है।
20. शरीर में आत्मा के होने का उदाहरण
जिस प्रकार फूल में गंध, तिल में तेल, लकड़ी में आग, दूध में घी और गन्ने में मिठास दिखाई न देने पर भी मौजूद रहती है, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दिखाई न देने वाली आत्मा का निवास माना गया है। इस रहस्य को विवेक से समझने की बात कही गई है।
As you seek fragrance in a flower, oil in the sesame seed, fire in wood, ghee (butter) in milk, and jaggery (guda) in sugarcane; so seek the spirit that is in the body by means of discrimination.
यह एक आध्यात्मिक और दार्शनिक विचार है। इसे विज्ञान के प्रत्यक्ष दावे के बजाय भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के दृष्टिकोण के रूप में समझना उचित है।
चाणक्य नीति Chapter 7 की प्रमुख सीख
चाणक्य नीति Chapter 7 में कई ऐसे विचार हैं जिन्हें आज के जीवन में उपयोगी रूप से समझा जा सकता है। इस अध्याय का सार केवल कठोर नियमों में नहीं, बल्कि व्यवहार और आत्मसंयम की सीख में है।
- हर निजी समस्या को हर व्यक्ति के सामने साझा नहीं करना चाहिए।
- ज्ञान और कौशल सीखने में अनावश्यक संकोच नहीं करना चाहिए।
- संतोष मानसिक शांति के लिए महत्वपूर्ण है।
- ज्ञान, अच्छे कार्य और दान में लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
- गलत और नुकसान पहुंचाने वाले लोगों से उचित दूरी रखना चाहिए।
- परिस्थिति के अनुसार विनय और दृढ़ता का उपयोग करना चाहिए।
- अत्यधिक भोलापन भी व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकता है।
- संबंधों को केवल स्वार्थ और लाभ के आधार पर नहीं चलाना चाहिए।
- धन का उचित उपयोग और दूसरों की सहायता करना महत्वपूर्ण है।
- क्रोध, कटु वाणी और खराब संगति से बचना चाहिए।
- अच्छी संगति से जीवन में बेहतर अवसर और सीख मिल सकती है।
- विद्या और कौशल को जीवन की महत्वपूर्ण शक्ति समझना चाहिए।
- परोपकार और दया को अच्छे जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।
चाणक्य नीति Chapter 7 से आज क्या सीखें?
चाणक्य नीति के इस अध्याय को पढ़ते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि इसके कुछ कथन प्राचीन सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था से जुड़े हैं। इसलिए उन्हें आज के समय में शब्दशः लागू करना उचित नहीं होगा।
इसके बावजूद, संतोष, समय की समझ, अच्छी संगति, शिक्षा, आत्मसंयम, सावधानी और परोपकार जैसी सीख आज भी प्रासंगिक हो सकती हैं।
खास तौर पर “सीधा व्यक्ति जल्दी कट जाता है” वाले विचार को यह समझने में मदद मिल सकती है कि ईमानदार रहने के साथ अपनी सीमाओं और सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसी तरह पशु-पक्षियों से जुड़ी सीखें मेहनत, सतर्कता और लक्ष्य पर ध्यान देने की प्रेरणा देती हैं।
चाणक्य नीति के अन्य अध्याय पढ़ें
अगर आपको चाणक्य नीति Chapter 7 के ये विचार पसंद आए हैं, तो आप इसके दूसरे अध्याय भी पढ़ सकते हैं:
- चाणक्य नीति Chapter 1 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 2 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 3 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 4 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 5 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 6 In Hindi
आप सम्पूर्ण चाणक्य नीति हिंदी में भी पढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष
चाणक्य नीति Chapter 7 में जीवन और व्यवहार से जुड़े अनेक विचार दिए गए हैं। इसमें संतोष, ज्ञान, धन, मित्रता, संगति, समय और आत्मसंयम जैसे विषयों पर ध्यान दिया गया है।
इस अध्याय की कई बातें आज भी उपयोगी लगती हैं। संतोष मन की शांति देता है। ज्ञान और कौशल व्यक्ति को मजबूत बनाते हैं। वहीं गलत संगति और लगातार नकारात्मक व्यवहार व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
साथ ही, प्राचीन नीतियों के उन हिस्सों को उनके समय और सामाजिक संदर्भ में समझना जरूरी है जो आज के जीवन से अलग हैं। इसलिए चाणक्य नीति की सबसे उपयोगी बात यह है कि हम उसके विचारों को समझें और जो सीख वर्तमान जीवन में उचित हो, उसे अपने व्यवहार में अपनाएं।
Note: सावधानी बरतने के बावजूद यदि ऊपर दिए गए किसी भी Quote (Hindi or English) में आपको कोई त्रुटि मिले तो कृपया comments के माध्यम से अवगत कराएं।
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