चाणक्य नीति Chapter 11 में आचार्य चाणक्य ने विद्या, शक्ति, परिवार, संगति, विद्यार्थी जीवन, अच्छे आचरण, दान और जीवन के उद्देश्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण विचार बताए हैं। इस अध्याय में व्यक्ति के स्वभाव और उसके कर्मों को महत्व दिया गया है।
चाणक्य विद्वान, दूरदर्शी तथा दृढ़संकल्पी व्यक्ति तो थे ही। साथ ही वे अर्थशास्त्र, राजनीति और कूटनीति के आचार्य भी थे। चाणक्य भारत के इतिहास के अद्भुत व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। उनकी कूटनीति को आधार बनाकर संस्कृत में ‘मुद्राराक्षस’ नामक प्रसिद्ध नाटक भी लिखा गया है।
इससे पहले आप चाणक्य नीति Chapter 10 भी पढ़ सकते हैं। अब आइए जानते हैं चाणक्य नीति एकादश अध्याय के महत्वपूर्ण विचारों को सरल भाषा में।
चाणक्य नीति Chapter 11
1. व्यक्ति में कौन से गुण स्वाभाविक होने चाहिए?
मनुष्य में चार बातें स्वभावतः होनी उचित हैं। वे हैं दान देने की इच्छा, मीठा बोलना, सहनशीलता और उचित अथवा अनुचित का ज्ञान। इन बातों को व्यक्ति में सहज भाव से ही होना चाहिए। मूल चाणक्य नीति में कहा गया है कि ये गुण केवल अभ्यास से प्राप्त नहीं किए जा सकते।
Charitable disposition, sweet voice, patience and discernment of right and wrong; these four natural qualities. One cannot learn them by training.
सीख: दया, मधुर वाणी, धैर्य और सही-गलत की समझ अच्छे व्यक्तित्व के महत्वपूर्ण गुण हैं।
2. अपने लोगों को छोड़कर दूसरों का साथ देने के बारे में नीति
जिस प्रकार एक राजा अत्यधिक अधर्म के आचरण से नष्ट हो जाता है और उसका पाप ही उसे समाप्त कर देता है, ठीक उसी प्रकार अपने लोगों को छोड़कर दूसरों को अपनाने वाला मूर्ख व्यक्ति भी अपने-आप नष्ट हो जाता है।
He who forsakes his own community and joins another perishes as the king who embraces an unrighteous path.
यह कथन प्राचीन सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को दर्शाता है। आज इसे अपने संबंधों और जिम्मेदारियों से बिना सोचे-समझे मुंह मोड़ने के बारे में एक चेतावनी के रूप में समझा जा सकता है।
3. शक्ति केवल शरीर के आकार में नहीं होती
छोटे से अंकुश से इतने बड़े हाथी को साधा जा सकता है। छोटे से दीपक से इतना व्यापक अंधकार नष्ट हो जाता है। छोटे से वज्र से विशाल और ऊंचे पर्वत भी टूटने का उदाहरण दिया गया है।
इन उदाहरणों से यह समझाया गया है कि तेज और ओज में शक्ति रहती है। केवल मोटापे या बड़े शरीर को बल का प्रतीक समझना सही नहीं है।
The elephant has a huge body but is controlled by the Ankush (goad): yet, is the goad as large as the elephant? A lighted candle banishes darkness: is the candle as vast as the darkness? A mountain is broken even by a thunderbolt: is the thunderbolt therefore as big as the mountain? No, he whose power prevails is really mighty; what is there in bulk?
सीख: असली शक्ति हमेशा शरीर के आकार में नहीं होती। बुद्धि, क्षमता, साहस और प्रभाव भी व्यक्ति की ताकत बन सकते हैं।
4. कलियुग और धर्म के बारे में प्राचीन कथन
मूल चाणक्य नीति में कलियुग से संबंधित एक भविष्यवाणी का वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है कि जब कलियुग के समाप्त होने में दस हजार वर्ष शेष रह जाएंगे, तब भगवान भारत से बाहर चले जाएंगे। पांच हजार वर्ष शेष रहने पर धरती पर गंगा का जल नहीं रहेगा और ढाई हजार वर्ष पहले ग्रामदेवता भी गांवों से चले जाएंगे।
इसका तात्पर्य मूल लेख में यह बताया गया है कि जब अधर्म बढ़ जाता है, तो अपने भी साथ छोड़ जाते हैं।
When Kaliyug is ten thousand years old, the Lord Vishnu goes back to His heavenly abode deserting earth. Five thousand years hence, river Ganga dries up and two thousand and five hundred years from that all the deities will depart.
नोट: यह प्राचीन धार्मिक परंपरा से जुड़ा कथन है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक या ऐतिहासिक भविष्यवाणी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
5. मोह, लोभ और आसक्ति के बारे में चाणक्य का विचार
घर के सुखों अथवा परिवार में अत्यधिक मोह रखने वाला व्यक्ति कभी विद्या प्राप्त नहीं कर सकता। मांस खाने वाले के मन में कभी दया का भाव नहीं उपज सकता। धन का लोभी कभी सत्यभाषण नहीं कर सकता। स्त्रियों में अत्यधिक आसक्ति रखने वाला कामी पुरुष पवित्र और सदाचारी नहीं रह सकता, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
A man tied to making both ends meet for the family has no time for learning, a meat-eater has no mercy, a greedy person knows no truth and a person infatuated with a woman is not pious.
आज के संदर्भ में: इन कथनों को शब्दशः सार्वभौमिक नियम मानना उचित नहीं है। मुख्य सीख अत्यधिक मोह, लोभ और अनियंत्रित आसक्ति से बचने की है।
6. दुर्जन व्यक्ति को बदलना कठिन हो सकता है
नीम के वृक्ष की जड़ को कितना ही दूध और घी से सींचा जाए, नीम का वृक्ष अपना कड़वापन छोड़कर मीठा नहीं हो सकता। उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति को कितना भी समझाने की चेष्टा की जाए, वह अपनी दुर्जनता छोड़कर सज्जनता को नहीं अपना सकता, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है।
Feeding milk and honey to the roots of a Neem tree does not make it shed bitterness. Similarly, good advice is wasted on an evil person.
इसका मुख्य संदेश यह है कि किसी ऐसे व्यक्ति को बदलना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता जो अपने गलत व्यवहार को बदलना ही नहीं चाहता।
7. केवल बाहरी शुद्धता पर्याप्त नहीं
जिस पात्र में शराब अथवा मादक द्रव्य रखा जाता है, उसे आग से तपाए जाने पर भी उसकी गंध पूरी तरह नहीं जाती और वह शुद्ध नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार कुटिल मन वाला व्यक्ति, जिसके मन में पाप भरा है, सैकड़ों तीर्थों में स्नान करने पर भी पवित्र और निष्पाप नहीं हो सकता, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
A container that contained wine does not become pure even after getting heated in the fire and a hundred times. Similarly, a person’s heart that contains evil does not become purified even after hundred pilgrimages.
सीख: केवल बाहरी दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का मन, व्यवहार और आचरण है।
8. किसी चीज का मूल्य न जानने वाला उसे कम समझ सकता है
जिस व्यक्ति को किसी विशेषता या गुण का ज्ञान नहीं होता, यदि ऐसा व्यक्ति किसी चीज की निंदा करता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जिसकी निंदा की जाती है, उसकी भी कोई वास्तविक हानि नहीं होती।
उदाहरण के रूप में भीलनी का उल्लेख किया गया है। यदि उसे गजमुक्ता जैसी मूल्यवान मणि मिल जाए और वह उसका मूल्य न जानती हो, तो वह उस मणि को फेंककर घुघुंची की माला पहन सकती है।
One who does not know the qualities of a thing insults it. Just like a tribal woman who throws away Gajamukta pearls and wears cheap beads.
सीख: किसी चीज की कद्र करने के लिए उसके वास्तविक गुणों को समझना जरूरी है।
9. मौन और संतोष से भोजन करने का प्राचीन धार्मिक विचार
वर्ष भर नित्यप्रति मौन रहकर भोजन करने वाले व्यक्ति के बारे में चाणक्य नीति में बहुत लंबे स्वर्गवास और देवताओं द्वारा पूजा किए जाने का उल्लेख मिलता है।
Those who partake food with contentment and silence, they enjoy the happiness of eternal heavens.
नोट: यह प्राचीन धार्मिक मान्यता का कथन है। इसमें दिए गए स्वर्ग और आध्यात्मिक फल को धार्मिक विश्वास के रूप में समझना चाहिए।
10. विद्यार्थी को कौन-सी आठ बुराइयां छोड़नी चाहिए?
विद्यार्थी को अपने लक्ष्य की सफलता के लिए आठ बुराइयां छोड़ देनी चाहिए, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है। ये हैं:
- काम-विषय का अत्यधिक चिंतन।
- क्रोध।
- लोभ।
- स्वाद के पीछे अत्यधिक भागना।
- श्रृंगार में अत्यधिक समय लगाना।
- कौतुक यानी खेल-तमाशे और मनोरंजन में अत्यधिक समय बिताना।
- अतिनिद्रा यानी बहुत अधिक सोना।
- अतिसेवा यानी किसी दूसरे की बहुत अधिक चाकरी करना।
मूल नीति में कहा गया है कि इनमें से एक भी दुर्गुण विद्यार्थी को अपने लक्ष्य तक पहुंचने से रोक सकता है।
Sex, anger, greed, taste, preening, play, sleep, and excess anything—these eight things must be strictly avoided by a student.
आज के संदर्भ में: विद्यार्थी जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात समय का सही उपयोग, ध्यान और अनुशासन है। मनोरंजन पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है। लेकिन वह पढ़ाई और लक्ष्य में बाधा नहीं बनना चाहिए।
11. ऋषि के बारे में चाणक्य का विचार
धरती पर अपने आप उगने वाले फल-फूल का सेवन करने वाला, अर्थात ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति से संतुष्ट रहने वाला, वन में अनासक्त भाव से रहने वाला तथा प्रतिदिन पितरों का श्राद्ध-तर्पण करने वाला ब्राह्मण ऋषि कहलाता है, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है।
One who eats fruits and edible roots from uncultivated land, one who is content with whatever food nature provides, one who loves the wild and one who pays daily homage to departed ones, is the real saint.
यह वर्णन प्राचीन वैदिक और धार्मिक जीवन-पद्धति के संदर्भ में है।
12. द्विज और ब्राह्मण के बारे में प्राचीन वर्णन
दिन में एक समय भोजन करके संतुष्ट रहने वाला, छः कर्तव्य-कर्मों का पालन करने वाला, यज्ञ करना और कराना, वेदों का अध्ययन और अध्यापन करना तथा दान देना और लेना जैसे कार्य करने वाला तथा ऋतुकाल में ही पत्नी के साथ संबंध रखने वाला ब्राह्मण द्विज कहलाता है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
A true Brahmin is he, who eats one meal a day, does and conducts yagna, studies teaches, gives charity, receives alms and makes love to his woman only when she has her monthly period.
नोट: यह प्राचीन धार्मिक और वर्ण-आधारित व्यवस्था का वर्णन है। इसे आधुनिक समाज में व्यक्ति की पहचान तय करने वाला नियम नहीं माना जाना चाहिए।
13. जन्म से अधिक जीवन के कर्मों पर जोर
सदा सांसारिक कार्यों में व्यस्त रहने वाला, पशुओं का पालन करने वाला, व्यापार तथा कृषि-कर्म से अपनी आजीविका चलाने वाला ब्राह्मण, ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न होकर भी वैश्य कहलाता है, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है।
A Brahmin engaged in worldly pursuit, animal farming, business, and cultivation is merely a trader. No Brahmin.
इस कथन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें व्यक्ति के कार्य को उसकी पहचान से जोड़ा गया है।
14. व्यापार के आधार पर वर्ण के बारे में प्राचीन कथन
लाख, तेल, नील, कपड़े, रंग, शहद, घी, मदिरा और मांस आदि का व्यापार करने वाला ब्राह्मण शूद्र कहलाता है, ऐसा मूल चाणक्य नीति में कहा गया है।
A Brahmin who deals in lakh products, oil, indigo, flower, honey, ghee, and wine, is a Shudra person.
नोट: यह प्राचीन वर्ण-व्यवस्था से जुड़ा हुआ विचार है। आज किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान या सम्मान को उसके जन्म और पेशे के आधार पर तय करना उचित नहीं माना जाता।
15. दूसरों को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति के बारे में कठोर उपमा
दूसरों के कार्यों को बिगाड़ने वाला, पाखंडी, अपना ही प्रयोजन सिद्ध करने वाला अर्थात स्वार्थी, धोखेबाज, अकारण दूसरों से शत्रुता करने वाला और ऊपर से कोमल लेकिन अंदर से क्रूर व्यक्ति को मूल नीति में निकृष्ट पशु की उपमा दी गई है।
One who puts hurdles in the way of others, one who is vengeful, selfish, deceitful, and quarrelsome and sweet-tongued but wicked at heart, such Brahmin is a tomcat.
सीख: केवल मीठी भाषा से किसी व्यक्ति का चरित्र अच्छा साबित नहीं होता। उसके व्यवहार और कर्मों को भी देखना चाहिए।
16. सार्वजनिक और धार्मिक स्थानों को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति के बारे में कथन
बावड़ी, कूप, तालाब, बाग और देव मंदिरों को तोड़ने-फोड़ने में संकोच न करने वाला ब्राह्मण अपने निकृष्ट कर्मों के कारण म्लेच्छ कहलाता है, ऐसा चाणक्य नीति में कहा गया है।
Brahmin who destroys water spring, well, pond, garden, and temples is meanest person who is not fit to be called a Hindu.
इस विचार का उपयोगी संदेश सार्वजनिक संसाधनों, जलस्रोतों, बाग-बगीचों और धार्मिक स्थलों को नुकसान न पहुंचाने से जुड़ा है।
17. चोरी और व्यभिचार के बारे में कठोर नीति
देवताओं और गुरुओं की संपत्ति को हड़प जाने वाला, दूसरों की स्त्रियों से व्यभिचार करने वाला तथा दूसरों से मांगकर अपने जीवन का निर्वाह करने वाला ब्राह्मण चांडाल कहलाता है, ऐसा मूल नीति में कहा गया है।
One who steals deity’s money, temple collections or property, guru’s money, one who uses another’s wife and one who accepts offerings from all and sundry, such Brahmin is a scavenger.
सीख: चोरी, विश्वासघात और दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन व्यक्ति की प्रतिष्ठा और संबंधों को नुकसान पहुंचा सकता है।
18. धन और अन्न को केवल जमा नहीं करना चाहिए
भाग्यशाली पुण्यात्माओं को खाद्य पदार्थ यानी खाने-पीने की सामग्री और धन-धान्य का संग्रह करते रहने के बजाय जरूरतमंद लोगों को दान देना चाहिए। दान देने के कारण ही बलि, कर्ण और विक्रमादित्य जैसे राजाओं की कीर्ति संसार में फैलने की बात कही गई है।
Fortunate people with souls should not sit upon stored food grains and money earned. They should be charitable. The kings who were known for charity are still remembered and praised. On the contrary, when honey gets destroyed for some reason, the bees who stored it lament that they neither used honey themselves nor gave it to others.
सीख: संसाधनों का सही उपयोग और जरूरतमंदों की सहायता करना दान की मूल भावना से जुड़ा है।
चाणक्य नीति Chapter 11 की प्रमुख सीख
चाणक्य नीति Chapter 11 में अलग-अलग विषयों के माध्यम से जीवन और व्यवहार की कई बातें समझाई गई हैं। इनमें से कई सीख आज भी उपयोगी रूप में समझी जा सकती हैं।
- दान, मधुर वाणी और सहनशीलता को महत्व दें।
- अपने निर्णय और व्यवहार के प्रति जिम्मेदार रहें।
- केवल शरीर के आकार को शक्ति का मापदंड न मानें।
- अत्यधिक लोभ और मोह से बचें।
- केवल बाहरी दिखावे के बजाय आचरण पर ध्यान दें।
- किसी व्यक्ति की बात पर भरोसा करने से पहले उसके कर्म देखें।
- विद्यार्थी जीवन में अनुशासन और लक्ष्य पर ध्यान रखें।
- ज्ञान को समझने और व्यवहार में लागू करने की कोशिश करें।
- सार्वजनिक संसाधनों और धार्मिक स्थलों का सम्मान करें।
- धन और अन्न का उचित उपयोग करें और जरूरतमंदों की सहायता करें।
चाणक्य नीति Chapter 11 से आज क्या सीखें?
इस अध्याय का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके गुणों और कर्मों से बनती है। केवल जन्म, बाहरी रूप या धन के आधार पर किसी व्यक्ति का मूल्य तय नहीं किया जा सकता।
विद्यार्थियों के लिए भी यह अध्याय उपयोगी बातें देता है। लक्ष्य पर ध्यान, समय का सही उपयोग और गलत आदतों से बचना सफलता की दिशा में मदद कर सकता है।
इसके अलावा, दान, अच्छे आचरण और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने से जुड़ी बातें भी आज के सामाजिक जीवन में समझी जा सकती हैं।
आप व्यक्तित्व और व्यवहार से जुड़ी व्यक्तित्व के प्रबंधन वाली पोस्ट भी पढ़ सकते हैं।
संतोष और दूसरों के लिए जीने से जुड़ी सीख के लिए खुशियों की परिभाषा और दूसरों के लिए जीना भी पढ़ें।
चाणक्य नीति के अन्य अध्याय पढ़ें
अगर आपको चाणक्य नीति Chapter 11 के ये विचार पसंद आए हैं, तो आप इसके दूसरे अध्याय भी पढ़ सकते हैं:
- चाणक्य नीति Chapter 1 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 2 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 3 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 4 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 5 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 6 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 7 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 8 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 9 In Hindi
- चाणक्य नीति Chapter 10 In Hindi
आप सम्पूर्ण चाणक्य नीति हिंदी में भी पढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष
चाणक्य नीति Chapter 11 में दान, मधुर वाणी, सहनशीलता, शक्ति, विद्यार्थी जीवन, संगति, अच्छे आचरण और जीवन के उद्देश्य से जुड़े विचार मिलते हैं। कई विचार आज भी व्यक्ति को अपने व्यवहार और आदतों पर विचार करने की प्रेरणा देते हैं।
विद्यार्थी के लिए अनुशासन, सामान्य व्यक्ति के लिए अच्छे गुण, समाज के लिए दान और सभी के लिए उचित आचरण इस अध्याय की प्रमुख बातों में शामिल हैं।
साथ ही, इस अध्याय में वर्ण, धर्म और सामाजिक भूमिकाओं से जुड़े कुछ कथन प्राचीन व्यवस्था को दर्शाते हैं। इसलिए उन्हें आधुनिक समाज के लिए शब्दशः नियम मानने के बजाय उनके ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ना बेहतर है।
अंततः चाणक्य नीति की उपयोगी सीख यही है कि व्यक्ति अपने ज्ञान, व्यवहार, कर्म और निर्णयों पर ध्यान दे तथा अपनी क्षमता के अनुसार अच्छा जीवन जीने का प्रयास करे।
Note: सावधानी बरतने के बावजूद यदि ऊपर दिए गए किसी भी Quote (Hindi or English) में आपको कोई त्रुटि मिले तो कृपया comments के माध्यम से अवगत कराएं।
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